Tuesday, May 24, 2011

हाथी की सवारी (नाम्दाफा नॅशनल पार्क)

अगले दिन हम लोगों ने hornbill bird देखने का कार्यक्रम बनाया था । hornbill कैंप जाने मे कितना समय लगेगा ये हर कोई अलग बताता था कोई कहता हाथी से जाने मे ४ घंटे लगते है और पैदल २-३ घंटे लगते है तो कोई कहता कि पैदल जाने मे ४ घंटे लगते है और हाथी से २- ३ घंटे मे पहुँच जाते है।किस भी हाल मे ७-८ घंटे तो लगने ही थे। हाथी से इसलिए जाना पड़ता है क्यूंकि नदी क्रॉस करनी पड़ती है और वहां पर एक लकड़ी की बोट तो होती है पर उसे चलाने के लिए कोई नहीं होता है। :(



खैर चूँकि कैरी था इसलिए हम लोगों ने सोचा की २ घंटे मे जितनी दूर जा पायेंगे उतनी दूर ही जायेंगे क्यूंकि वापिस भी तो आना था । सबने कहा कि हाथी से जाइए क्यूंकि जंगल मे पैदल जाना मुश्किल है पैदल जाने मे लीच वगैरा बहुत चिपकती है। और हाथी पर सवारी करने को हम तैयार नहीं थे अरे भाई डर जो लगता है पर चूँकि कोई और आप्शन नहीं था और अगली बार फिर इतनी जहमत उठाकर आयेंगे कि नहीं ये भी पता नहीं था और एक लालच था कि शायद hornbill दिख जाए सो हम जिंदगी मे पहली बार हाथी कि वारी करने को तैयार हुए



अभी हम लोग नाश्ता कर ही रहे थे कि गेस्ट हाउस वाले ने बताया कि हाथी आ गया है। वो क्या है कि अगर जंगल मे हाथी से जाना होता है तो एक दिन पहले बताना पड़ता है । क्यूंकि हाथी को तैयार करना पड़ता है। ऐसा वो लोग कहते है।

सुबह नाश्ता करने के बाद कैरी को गेस्ट हाउस मे सैटल करके हम लोग निकले । पहले तो हाथी पर बैठना ही इतना मुश्किल काम उसपर जब वो चला तो हमारी तो जान ही निकल गयी। ऐसे हिचकोले खा रहा था कि बस पूछिए मत। ५ मिनट बाद ही हमने शोर मचाया कि बस रोको अब हमे और नहीं जाना । और हाथी को रुकवा दिया तो हमारे पतिदेव बोले कि डर क्यूँ रही हो कुछ नहीं होगा। बस डरो मत और शोर मत मचाओ वर्ना हाथी डिस्टर्ब होगा । और बोले कि सुबह तो तुमने रास्ता देखा ही है फिर क्यूँ डर रही हो। तो हमने कहा कि हमे कुछ नौशिया सा हो रहा है । अब हाथी जी कि मस्तानी चाल से हमें नौशिया सा महसूस होने लगा क्यूंकि नाश्ता करके जो निकले थे। :)

असल मे सुबह हम लोग नदी तक कैरी को घुमा कर लाये थे और रास्ते भर हाथी के पैरों के निशान भी देखे थे । खैर हाथी राम जी ने फिर चलना शुरू किया। और हमने अपना डर भगाने के लिए महावत से बात करनी शुरू की पर जब नदी के लिए उसने ऊपर से उतरना शुरू किया तब तो हमने भगवान को इतना याद किया कि बस पूछिए मत। और जैसे ही उसने नदी मे पैर रक्खा तो हम सामने देखने की बजाय नदी मे देख रहे थे जिसमे पानी इतना साफ़ था कि नीचे के बड़े-बड़े पत्थर दिखाई दे रहे थे । और हमें लग रहा था की अगर गजराज जी का पैर जरा भी इधर-उधर हुआ तो हम लोग सीधे पानी मे । :)



जैसे तैसे राम-राम करते नदी पार किया तो sea bed पर छोटे-बड़े पत्थरों पर हाथी जी ने चलना शुरू किया । अभी २ कदम चला कि रुक गया। और सूंड उठाकर बड़ी जोर से आवाज करी अरे मतलब चिंघाड़ा । तो महावत से पूछने पर कि क्या हुआ वो बोला कि आज अकेले जा रहा है जबकि कल २ हाथी गए थे इसलिए ये रुक रहा है। खैर हाथी ने फिर चलना शुरू किया और हम भगवान् को याद करते रहे और तकरीबन १ घंटे के बाद और २ और छोटी-छोटी क्रीक सी पार करते हुए hornbill कैंप जाने वाले पहाड़ और जंगल तक पहुंचे। और यहां पहुँचते ही गजराज जी ने धड़ाधड़ पेड़ों से डाल तोड़-तोड़ कर खानी शुरू कर दी बिलकुल किसी छोटे शैतान बच्चे की तरह । :) फोटो थोड़ी हिली हुई है क्यूंकि हाथी राम जी इतनी जोर-जोर से डालियाँ जो तोड़ रहे थे। :)

और हाथी जी का ये अंदाज देख कर तो हम और घबरा गए क्यूंकि आगे तो ऊँचे पहाड़ पर सिर्फ एक पैर रखने की जगह थी जहाँ से हम लोगों को जाना था और कैंप तक जाने मे २-३ घंटे और लगने थे तो हम लोगों ने थोड़ी दूर जाकर वापिस लौटना ही ठीक समझा। महावत से पूछने पर बोलता कि hornbill बहुत अन्दर जंगल मे दिखती है।

जब हम लोग जंगल से वापिस आ रहे थे तो देखा ४-५- औरतें एक-दूसरे का हाथ पकड़कर संभल-संभल कर नदी पार कर रही थी । वैसे जिस नदी को क्रॉस करने के लिए हम लोगों ने हाथी कि सवारी की उसे लोकल लोग ऐसे ही पार कर जाते है।वैसे ये बीच मे क्रीक जैसा पड़ता है । पर फिर भी गहरा तो होता ही है। इन औरतों के कमर से ऊपर तक पानी था।


खैर
लौटते हुए भी हाथी जी ने कम नहीं डराया । जाने मे तो फिर भी थोड़े कम गहरे पानी के रास्ते गए थे लौटने मे जब हाथी नदी मे उतरा तो उसके कान तक पानी था और जब नदी से बाहर आया तो एक लकड़ी के मोटे से log पर एक पैर और दूसरा पैर नदी मे और हमारी जान हलक मे। किसी तरह वहां से चले तो ऊपर चढ़ने मे बड़ा सोच-सोच कर और रुक-रुक कर चढ़ा । शायद कुछ calculate करता होगा। :)


जैसे ही हम गेस्ट हाउस पहुंचे हमने फटाफट हाथी से उतर कर सबसे पहले गजराज जी को औरभगवान् को धन्यवाद कहा और महावत को हाथी को खिलाने के लिए १०० रूपये दिए और महावत और उसके साथी को भी रूपये दिए।

और वैसे भी इतनी मेहनत और मशक्कत के बाद भी ना तो hornbill और ना ही कोई और जानवर हम लोगों को दिखा। पर हाँ हाथी की सवारी जरुर कर ली। :)

7 comments:

  1. हा हा हा हा ....आज पता चला ममता कितनी डरपोक है .........लीच को हाथ में लाकर देखतीं तो डर छूट जाता ! वैसे ......च्च..च्च ...च्च... निराशा....निराशा ........इतना डरने के बाद एक तो हार्न बिल दिखनी ही थी न ! कोई बात नहीं अगली बार आपको हिरन भी दिखेगा और चीता भी. जाना जरूर ...मगर इस बार हाथी से नहीं ...पैदल .....पैर में दो चार लीच भी तो चिपकनी चाहिए न !

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  2. बढ़िया प्रस्तुति शुभकामनायें आपको !
    आप मेरे ब्लॉग पे आये आपका में अभिनानद करता हु

    दीप उत्‍सव स्‍नेह से भर दीजिये
    रौशनी सब के लिये कर दीजिये।
    भाव बाकी रह न पाये बैर का
    भेंट में वो प्रेम आखर दीजिये।
    दीपोत्‍सव की हार्दिक शुभकामनाओं सहित
    दिनेश पारीक

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  3. आप की सभी यात्रा अदभुत !

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  4. ममता जी बहुत अच्छी पोस्ट हैं, नई जानकारी मिली हैं, धन्यवाद्.

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