Monday, February 28, 2011

silver jublee of arunachal pradesh statehood day


२० फरवरी २०११ को अरुणाचल प्रदेश ने अपने यूनियन टेरिटरी से राज्य बनने के २५ साल पूरे होने को खूब हर्षो-उल्लास से मनाया गया। इस समारोह का आयोजन ईटानगर के इंदिरा गाँधी पार्क मे आयोजित किया गया था । इस अवसर पर मोंटेक सिंह अहलुवालिया और उनकी त्नी इश जज अहलुवालिया मुख्य अतिथि थे ।

अरुणाचल के गवर्नर जे.जे सिंह ,उनकी पत्नी अनुपमा सिंह ,मुख्य मंत्री दोरजी खंडू और गुवाहाटी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश भी इस अवसर पर उपस्थित थे।

इस कार्यक्रम की शुरुआत मे सबसे पहले गवर्नर जे.जे. सिंह ने तिरंगा झंडा फहराया। उसके बाद राष्ट्रीयगान हुआ और फिर गवर्नर ,मुख्य मंत्री,और मुख्य अतिथि अहलुवालिया का भाषण हुआ।

इसके बाद गुवाहाटी के मुख्य न्यायाधीश ने अरुणाचल प्रदेश के सोविनियर का विमोचन किया । और उसके बाद रंगारंग कार्यक्रम पेश किये गए। जिसमे अरुणाचल की विभिन्न tribes ने डांस प्रस्तुत किये। ( जैसे गालो ,निशि,मोनपा,अपातानी ,अदि,मिश्मी,)

इन कार्यक्रमों के दौरान सारी जनता को टी.शर्ट ,कैप,और सोविनियर भी बांटे गए :)

इसके बाद गवर्नर,और मुख्य अतिथि ने पुस्तक मेला,food exibition stall,और pan east international expo जिसमे थाईलैंड,म्य्नामार ,कीनिया ,बांग्लादेश ,जैसे देशों की stalls का उदघाटन किया।जहाँ रियल स्टोन और अनेकों प्रकार की ज्वेलरी मिल रही थी वहीँ कोलकता के अचार और भी मिल रहे थे। साथ ही दिल्ली और मुंबई की भी दुकाने थी जहाँ बागवानी से जुडी चीजें मिल रही थी और साथ ही साथ थाईलैंड की पेंटिंग्स भी मिल रही थी। टर्की के lamp shade जो की बहुत ही खूबसूरत और महंगे थे मिल रहे थे ।


तीन दिन के इस समारोह मे यहां पर सारे दिन और शाम को कुछ ना कुछ कार्यक्रम चलते रहते थे दिन मे flower show ,किसकी सब्जी सबसे अच्छी,पचीस सवाल पचीस हजार,और डांस की अलग-अलग प्रतियोगिताएं होती रहती है।जिसमे बच्चे बड़े सभी भाग लेते थे।
रोज शाम को यहां पर कल्चरल प्रोग्रामे होते है जिसमे लोक नृत्यों के साथ-साथ मॉडर्न डांस भी होते थे

खाने-पीने की stall पर दिन मे तो कम पर रात मे खूब भीड़ होती है ।आखिरी दिन शाम को यहां rock show भी हुआ । 1 दिन तक चले इस पुस्तक मेले सब कुछ वैसा ही था जैसा की कहीं भी होता है मतलब जिसमे बच्चों से लेकर बड़े लोगों के लिए किताबें उपलब्ध थीबागवानी से लेकर रसोई तक ,शोभा डी से लेकर खुशवंत सिंह तक और सलीम अली से लेकर मामंग देई (अरुणाचल की है और उन्हें अभी हाल ही मे पद्म श्री भी मिला है ) तक सभी की किताबें उपलब्ध थी

इसी दिन से यहां पर खादी ग्रामोद्योग की प्रदर्शनी भी शुरू हुई। जिसकी वजह से यहां पर काफी रौनक रहती थी ।कुल मिलाकर काफी अच्छा रहा इन सभी मेलों मे घूमना :)

Tuesday, October 26, 2010

कुदरत के करिश्मे अरुणाचल के खूबसूरत पतंगे .... :)

कहीं आप लोग ये तो नहीं सोच रहे है कि आज अरुणाचल कि सैर कराने की जगह ये अरुणाचल के पतंगों के बारे मे पोस्ट क्यूँ।तो हमे यकीन है कि इस पोस्ट को पढने के बाद आप भी यही कहेंगे
आम तौर पर हम लोग पतंगों की तरफ कभी ध्यान नहीं देते है और ना ही उन्हें देखने की जरुरत ही समझते है पर यहां पर इन्हें इतने करीब से देखने पर लगा कि ये सिर्फ पतंगे नहीं बल्कि कुदर का एक करिश्मा है। जिससे हम लोग अनजान रहते है।
बेहद रंगीन (colourful) और डिजाइनदार और एक से बढ़कर एक । और हमें यकीन है की इन चंद फोटो को देखने के बाद आप भी यही कहेंगे।


अरे भई पतंगे इतने खूबसूरत और रंग-बिरंगे हो सकते है हमने तो ऐसा सोचाभी नहीं था पर जैसा कि हर जगह हम लोग कुछ नया देखते है तो यहां पर इतने अलग-अलग रंगों के पतंगे देखना भी बिलकुल ही नया अनुभव है।



और इन पतंगों को देख कर हम ये सोचने पर मजबूर हो जाते है कि कुदरत और भगवान ने इन्हेंकितना अनोखा बनाया है। हर पतंगे की अपनी ही विशेषता है।औ एक ख़ास बात ये सभी पतंगे रोज -रोज नहीं आते है बल्कि रोज नए आते है ।




अगर कभी हम ये सोचते है की चलो आज नहीं कल फोटो खींच लेंगे तो पता चला कि हम इंतज़ार ही करते रह जाते है। :)रात मे जो भी पतंगे आते है उनमे से कुछ फिर से वापिस नहीं उड़ कर जा पाते है क्यूंकि लाईट से टकराकर कुछ के पंख हल्के से टूट जाते है कुछ तो उड़ जाते है पर कुछ वापिस उड़ कर नहीं जापाते है।

इन खूबसूरत पतंगों के नाम तो हम नहीं जानते है पर हाँ इनके फोटो का एक अच्छा -ख़ासा collection हमारे पास हो गया है।



बारिश के दिनों (यहां तकरीबन पिछले ८ महीने से बारिश हो रही थी) मे तो रोज ही ढेरों पतंगे आ जाते थे पर आजकल बारिश बंद होने से इनका आना कुछ कम हो गया है। पर फिर भी रो एक-दो नए पतंगे नजर आ ही जाते है। :)





और हाँ ना केवल पतंगे बल्कि यहां पर कई तरह के मच्छर और मेढक भी हम देख चुके है। अब इतने बड़े पैरों वाले मच्छर को तो हमने पहली बार ही देखा है। :)


३-४ तरह के अलग -अलग रंग के मेढक देख चुके है । :)

चलिए तो आप लोग इन पतंगों को देखिये और बताइये क्या हमने कुछ गलत कहा है।

Thursday, September 9, 2010

Tak-Tsang Monastery यानि टी गुम्पा (तवांग ५ )

जैसा की हमने अपनी पिछली पोस्ट फ्रोजन लेक्स मे कहा था तो चलिए आज माधुरी लेक से आगे चलते है यानी टी .गुम्पा चलते है। माधुरी लेक से बस ५ की.मी.की दूरी पर ये छोटी सी Monastery है और ये Monastery बिलकुल पहाड़ के एक कोने पर बनी है। इस Monastery को Tak-Tsang या Tiger's Den भी कहा जाता है क्यूंकि यहां के लोगों का कहना है कि यहां पर जब इनके गुरु पदमासंभव आये थे तो एक टाइगर ने उनका स्वागत किया था और ये भी माना जाता है कि बहुत समय तक वहां पर टाइगर आते थे हालाँकि अब वहां टाइगर नहीं आते है। :)यहां तक जाने का रास्ता उबड़-खाबड़ तो जरुर था पर जल्दी ही इस रास्ते से होते हुए हम लोग इस टी.गुम्पा पर पहुँच गए। यहां पहुँचते ही चारों ओर से जोर-जोर से हवा की आवाज बिलकुल फ़िल्मी स्टाइल मे सुनाई देने लगी और चारों ओर लगे झंडे फडफडाते हुए खूब जोर-जोर से हवा मे झूमते हुए हिल रहे थे।और जैसा की इन झंडों के लिए कहा जाता है कि ये वातावरण को शुद्ध करते है उस बात को बिलकुल सही साबित कर रहे थे। और इस हवा की वजह से हम सबका ठण्ड के मारे बुरा हाल था जबकि टोपी और जैकट से हम सभी पूरी तरह से लैस थे ,और धूप भी काफी थी
गाडी से उतर कर एक खूबसूरत से गेट से हम लोग अन्दर दाखिल हुए तो सामने ही एक छोटी पर सुन्दर सी Monastery दिखाई दी। और तभी वहां के लामा अपने घर से निकलकर बाहर आये और हम लोगों ने लामा से मुलाकात कर उनसे इस गुम्पा के बारे मे जानकारी चाही। तो उन्होंने सबसे पहले मुख्या प्रार्थना भवन के बायीं ओर के पेड़ को दिखा कर बताया कि ऐसा कहा जाता है कि जब गुरु पदमासंभव यहां आये थे तो उन्होंने इसी पेड़ के नीचे आराम किया था और अपने घोड़े को इसी पेड़ से बाँधा था और अब इस पेड़ को बहुत ही auspicious माना जाता है ।जैसा कि आप इन झंडो को देख कर समझ सकते है। वहां आस-पास २-४ घर दिख रहे थे और Monastery के साथ ही लामा का घर बना हुआ था जहाँ लामा जी अकेले ही रहते है। और बातचीत मे जब उन्होंने इसे टाइगर डेन कहे जाने की बात कही तो अनायास ही हमने उनसे पूछ लिया की क्या आपको रात मे यहां अकेले डर नहीं लगता की कहीं टाइगर ना जाए तो वो बोले कि नहीं डर नहीं लगता है क्यूंकि अब टाइगर क्या रात मे तो इंसान भी नहीं आते है। वैसे दिन मे भी दूर-दूर तक कोई नजर नहीं आता है। :)
इस गुम्पा मे प्रवेश करने के पहले हम लोगों ने जूते उतारे और अन्दर प्रवेश किया तो सामने पदमासंभव की सुनहरी प्रतिमा दिखाई दी और इस प्रतिमा के चारों ओर भगवान बुद्ध के विभिन्न रूप दिखाई दिए और इस प्रतिमा के नीचे का बड़ा दीपक जल रहा था और साथ ही स्टील की छोटी-छोटी कटोरी मे पानी रक्खा था ।यहां पर भी हम लोगों ने सफ़ेद khoda चढ़ाया और जैसे ही इस प्रतिमा के दर्शन करके आगे बढ़ते है तो बायीं ओर दलाई लामा की फोटो नजर आती है।और यहां भी फोटो के नीचे छोटी-छोटी कटोरी मे पानी रक्खा था तो जिज्ञासा वश हमने लामा से पूछा कि इन कटोरियों मे पानी रक्खने का कोई ख़ास कारण है तो इस पर लामा ने बड़ी सादगी से हमे बताया कि रोज सुबह सारी कटोरियों को साफ़ करके वो उनमे पानी भरते है और रोज शाम को सारी कटोरियों का पानी खाली करते है । और फिर हँसते हुए बोले कि भगवान की आराधना ही तो हमारा काम है।( तकरीबन ६०-७० कटोरियों मे पानी रक्खा था )

इस छोटी सी Monastery के अन्दर चक्कर लगा कर हम लोग बाहर आये और Monastery का बाहर से चक्कर लगाया और फोट-शोटो खींची । Monastery के गेट से सामने वाले पहाड़ पर देखने पर पहाड़ की ऊँची चोटी पर कुछ झंडे लगे दिखे पूछने पर पता चला कि वहां पर लोग ध्यान लगाने के लिए जाते है। वैसे अपनी तो वो ऊँची चढ़ाई देखकर ही हिम्मत जवाब दे गयी थी। :)
वहां
लामा से हम लोग बात कर ही रहे थे कि तभी ये दो छोटे से बच्चे आये । यहां के बच्चे बड़े ही जोशीले है । जब भी हम लोगों की गाडी कहीं से गुजरती और अगर वहां कुछ बच्चे होते तो बच्चे पूरे जोश से हाथ हिला-हिला कर wave करते । और कैमरा देख कर तो बच्चे बहुत खुश होते है ।और झट फोटो के लिए pose दे देते है। :)

Monday, August 23, 2010

फ्रोजन लेक्स ऑफ़ तवांग frozen lakes of tawang (तवांग ४)

तवांग की यात्रा के दौरान वहां की फ्रोजन लेक्स के बारे मे पता चला जिसे सुनकर थोडा आश्चर्य भी हुआ की तवांग जैसी जगह मे लेक्स भी है । वहां पर छोटी-बड़ी बहुत सारी तकरीबन १०० से भी ज्यादा लेक्स है पर उनमे से कुछ बहुत मशहूर है जैसे PT Tso (panggang- teng- Tso ) जो की १४ की.मी. की दूरी पर है और वहां से तकरीबन २०-२५ की.मी. आगे जानेपर jong-nga-tseir या shungetser lakeजिसे अब माधुरी लेक भी कहा जाता है ,पड़ती है ।और पूरे ४० -४५ की.मी. के रास्ते मे ढेरों लेक्स पड़ती है जिन्हें देखकर मन खुश होता रहता है। हालाँकि रास्ता बहुत खराब है और बहुत ही दुर्गम से पहाड़ है पर थोड़ी-थोड़ी बर्फ पहाड़ों पर जमी हुई, याक , लेक्स और रास्ते भर आर्मी की गाड़ियों को देखते हुए वो खराब रास्ता भी पार हो जाता है ।पूरे रास्ते बस आर्मी के कैंप और बंकर नजर आते है।

तो अगले दिन सुबह सुबह वहां जाने का कार्यक्रम बनाया गया और साथ मे खाना-पानी वगैरा भी पैक करा गया क्यूंकि इन लेक्स पर कहीं भी कुछ भी खाने के लिए नहीं मिलता है। और रास्ते मे कुछ मिलने का सवाल ही नहीं है। खैर सुबह २ गाड़ियों (टाटा सुमु ) मे हम लोग चले ।

तो सबसे आर्मी की एक चेक पोस्ट पड़ी और वहां पर एंट्री करके आगे चले तो ५ की.मी.जाने पर आर्मी की एक और चेक पोस्ट हर मैदान फ़तेह मराठा ग्राउंड पड़ी जहाँ एक बार फिर से एंट्री करनी पड़ी और फिर वहां से आगे बढ़ने पर पेड़ों और पहाड़ों पर जमी बर्फ और इधर-उधर घूमते हुए याक नजर आये ।वैसे वहां के लोगों ने बताया की इस पूरे रास्ते बहुत सुन्दर orchids दिखते है जिनकी वजह से रास्ता बहुत खूबसूरत लगता है पर चूँकि उस समय सीजन नहीं था इसलिए हम orchids नहीं देख पाए।
६ की.मी. और आगे जाने पर PT Tso lake पड़ी और जब हम लोग कार से उतरे तो बूडूम - बूडूम की आवाज आई ।और जब लेक के पास पहुंचे तो बर्फ चटकने की आवाजें बिलकुल साफ़ सुनाई देनी लगी। और इस बूडूम-बूडूम मे एक अजीब सी गूँज सी हो रही थी। जिसे सुनकर बहुत रोमांच सा हो रहा था। लेक के इस तरफ बौद्ध धर्म के झंडे जिन्हें माना जाता है की ये हवा को और आस-पास के माहौल को शुद्ध करते है वो लगे हुए थे और लेक के दूसरी तरफ पहाड़ थे जिनमे कुछ हरे रंग के और कुछ लाल रंग के पेड़ और उन पर थोड़ी-थोड़ी बर्फ बड़ी अलग से लग रही थी


PT Tso पर कुछ फोटो वगैरा खींच कर हम लोग आगे चल पड़े तो थोड़ी दूर पर एक और आर्मी की चेक पोस्ट पड़ी।और यहां से एक रास्ता कट कर बूमला जाता है जो आगे चीन के बार्डर तक जाता है। खैर हम लोग बूमला ना जाकर आगे बढे और ऊँचे-नीचे उबड़-खाबड़ रास्ते से होते हुए shungetser lake यानी माधुरी लेक की तरफ बढ़ते रहे ।रास्ते भर lakes तो बहुत दिखी पर उनमे से कुछ lakes आधी फ्रोजन यानी जमी हुई थी तो आधी मे पानी दिख रहा था।जैसे-जैसे माधुरी लेक के पास पहुँचने लगे तो सड़क के दोनों ओर और सड़क पर भी बर्फ दिखाई पड़ी। और इस माधुरी लेक के लिए कहा जाता है ये लेक १९७३ मे आई बाढ़ का परिणाम है। और हाँ इसे माधुरी लेक क्यूँ कहा जाता है ये तो ताया ही नहींवो क्या है ना की फ़िल्म कोयला की शूटिंग के लि माधुरी और शाह रूख खान यहां आये थे और बस उसके बाद से इस लेक को माधुरी लेक कहा जाने लगा।( ये माधुरी लेक की ऊपर से खींची हुई फोटो है )इस लेक पर पहुंचकर गाडी से उतरने पर पहले तो कुछ सेना के जवान दिखाई दिए और फिर हम लोग एक छोटे से लकड़ी के पुल से चलकर कच्चे-पक्के रास्ते से होते हुए इस फ्रोजन माधुरी लेक तक पहुँच गए।लेक के चारों और काले पत्थरों के पहाड़ दिखाई दे रहे थे और लेक के बीच-बीच मे सूखे हुए पेड़ के तने दिखाई दे रहे थे। और लेक पर पैर रखते ही एक अदभुद सा रोमांच हुआ पर हम लोग बहुत आगे तक नहीं गए पर हम लोगों के साथ गए हुए कुछ लोग चल कर लेक के बिलकुल बीच मे पहुँच गए थे और हमें भी कह रहे थे की मैडम डरिये मत ,आप लोग भी आ जाइए,पर हमारी हिम्मत नहीं हो रही थी (अरे भाई टी.वी.मे देखा है की किस तरफ अचानक ही बर्फ टूट जाती है ) पर जैसे ही बर्फ मे से ब्डूम की आवाज आई वो सभी चिल्लाते हुए दौड़ते हुए वापिस हम लोगों की तरफ भागे।फिर वहां बर्फ पर थोड़ी देर रूक कर हम लोग वापिस लौट कर बाहर आ गए और अपने साथ लाये हुए ब्रेड पकोड़ा ,सैंडविच ,पकोड़े, चाय,पेप्सी वगैरा खाया -पिया और एक बार फिर गाडी मे वापसी की यात्रा शुरू की।वैसे यहां पर एक रेस्तौरेंट बना हुआ है पर चलता कम है क्यूंकि वहां ज्यादा लोग जाते नहीं है। (उस दिन तो बंद ही था ) :(और जब हम लोग खा-पी रहे थे तो वहां ३-४ doggi आ गए थे ।और बहुत शांति से बैठ गए तो हम लोगों ने उनको भी खाना खिलाया। वहां से हम लोग २ बजे तक निकल लिए क्यूंकि वहां पर अँधेरा बहुत जल्दी हो जाता है और रास्ते मे लाईट होती नहीं है और रास्ते भी कुछ ज्यादा अच्छे नहीं है। और रास्ते मे कब क्या मुसीबत आ जाए कहा नहीं जा सकता।
वो ऐसा हम इसलिए कह रहे है क्यूंकि जैसे हम ही लोग वापिस लौटने लगे तो ४-५ की.मी.बाद ही बीच सड़क मे एक आर्मी का ट्रक कुछ इस तरह से खराब हुआ था और सड़क पर खड़ा था की ना तो कोई गाडी आ सकती थी और ना ही जा सकती थी। और वो लोग आराम से गाडी बनाने मे लगे थे। १५-२० मिनट तक हम लोग खड़े रहे फिर हम लोगों ने ड्राईवर को कहा कि जाकर बोलो कि ट्रक को एक तरफ साईड मे कर ले । पर ट्रक को हिलाना भी आसान नहीं था क्यूंकि चढ़ाई पर ट्रक खराब हुआ था।और ड्राईवर के कहने पर पहले आर्मी वालों को समझ भी नहीं आया । उन्हें लगा कि क्या बेवकूफी की बात कर रहे है। पर खैर आधे घंटे बाद उनकी मदद के लिए एक और ट्रक आया और फिर उन लोगों ने ट्रक को थोडा धक्का देकर एक साइड मे किया और फिर हम लोग वहां से निकल पाए।इस lake से ५ की.मी. आगे टी. गुम्पा (Tak-Tsang Monastery) पड़ती है । उसका जिक्र अगली पोस्ट मे।

Thursday, August 19, 2010

कॉमन वेल्थ गेम्स क्वींस बैटन रिले ( C W G queen's baton relay in itanagar)

अब चाहे जितने भी scam हो कॉमन वेल्थ गेम्स को लेकर पर जिस भी राज्य मे क्वींस बैटन आती है वो पूरा राज्य जोश मे भर जाता है अब जैसे जुलाई मे जब क्वींस बैटन यहां आई तो ऐसा ही कुछ अरुणाचल मे भी हुआ था

जैसा
कि हम सभी को पता है कि इस साल अक्तूबर से दिल्ली मे कॉम वेल्थ गेम्स होने वाले है
और
इसके लिए लन्दन से क्वीन एलिजाबेथ 2 ने खिलाड़ियों के लिए न्देश इस बैट मे भेजा है और इस सन्देश को अक्तूबर को दिल्ली मे खेलों के उदघाटन समारोह मे पढ़ा जाएगा क्वीन के सन्देश के साथ इस बैटन ने २९ अक्टूबर २००९ मे बकिंघम पैलस से अपना सफ़र शुरू किया ये बैटन ७० देशों और पूरे भारत वर्ष मे घूमने के बाद अक्टूबर को दिल्ली पहुंचेगी

इस बैटन के साथ तकरीबन १०-१५ लोगों की टीम चलती है इस टीम को जनरल कदीयान लीड कर रहे थे इस बैटन की खासियत ये है कि जब इसमें लाईट जलती है तो भारत के झंडे का तिरंगा रंग इस बैटन पर नजर आता हैजो बहुत ही खूबसूरत लगता है दिन मे और रात मे बैटन बिलकुल अलग लगती है

और २२ जुलाई को कॉमन वेल्थ गेम्स की क्वींस बैटन अरुणाचल प्रदेश के ईटानगर मे आई थी अरुणाचल प्रदेश दसवां राज्य है जहाँ ये बैटन अपना सफ़र करते हुए पहुंची थी अरुणाचल प्रदेश के दो डिस्ट्रिक्ट तवांग और ईटानगर मे इस बैटन को जाना था ,पहले इसे तवांग और फिर ईटानगर आना था और इसके लिए गौहाटी से इस बैटन को लेकर हेलीकाप्टर से तवांग के लिए लोग रवाना हुए पर भूटान के आगे मौसम खराब होने के कारण हेलिकॉप्टर वापिस गौहाटी लौट आया फि गौहाटी से हेलिकॉप्टर से ये बैटन ईटानगर गयीनाहारलागन हेलीपैड पर हेलीकाप्टर के पायलेट और पादी रिको इस बैटन के साथ
अब जब हम ईटानगर वापिस लौट आये है तो हम भी इस क्वींस बैटन रिले को देखने पहुँच गए सबसे पहले नाहर लागन हेलीपैड पर सवा दो बजे इस बैटन को पादी रिको जो की पार्लियामेंट्री सेक्रेटरी है उन्होंने इसे रिसीव किया और बैटन का रिले शुरू हुआ जिसमे convoy और relay दोनों था बैटन के साथ शेरा जो की कॉमन वेल्थ गेम्स का मेस्कोट है वो भी आया था जैसा की आप इन कुछ फोटो मे देख सकते हैराजीव गाँधी स्टेडीयम मे बच्चों के बीच मे शेरा और नीचे वाली फोटो बैंक्वेट हाल की है जहाँ शेरा जब stage पर गए थे तो वापिस उतरने का नाम ही नहीं ले रहे थेपूरे stage पर घूम रहे थे :)और भाई जब हम relay देखने गए तो फिर शेरा से हाथ कैसे ना मिलाते :) चूँकि इस बैटन मे relay और convoy दोनों था इसलिए कुछ दूर खिलाडी दौड़ते थे तो कुछ दूर convoy इस बैटन को लेकर चलता थाये relay करीब घंटे की थीजिसमे नाहर लागन से होकर राजीव गाँधी स्टेडीयम,सांगो होटल,जेनरल हॉस्पिटल, लागुन ब्रिज,डी.सी. ऑफिस,राज भवन ,इटा फोर्ट,टी.जी.गुम्पा,लेजी काम्प्लेक्स,पंजाबी ढाबा,आई.जी.पार्क,बी.बी.प्लाज़ा,आकाशदीप मार्केट,निर्वाच वन,से होते हुए बैनक्वेट हॉल मे आनी थीयानी की पूरे ईटानगर मे इस बैटन को घुमाया गया
हेलीपैड से सबसे पहले एक काफिले के साथ इस बैटन को राजीव गाँधी स्टेडीयम ले जाया गया जहाँ इस बैटन को रक्खा या और फिर मुख्य अतिथि के छोटे से भाषण के बाद इस बैटन को gumpe rime जो की फूटबाल खिलाडी है ये बैटन उन्हें सौंपी गयी और gumpe rime ने पूरे स्टेडीयम का चक्कर लगाया
और वहां से ये बैटन अनेकों खिलाड़ियों और officials के हाथोंमे होती हुई शाम साढ़े बजे आई .जी. पार्क पहुंची और वहां से बैनक्वेट हॉल तक अलग-अलग खेलों जैसे फूटबाल,बैडमिनटन,और वेट लिफ्टिंग के खिलाड़ियों ने इस बैटन को लेकर रिले किया यानी इसे लेकर दौड़ेजब ये बैटन बैनक्वेट हॉल के गेट पर पहुंची तो वहां से अरुणाचल प्रदेश के स्पोर्ट्स सेक्रेटरी इस बैटन को लेकर दौड़े और पोर्टिको मे ये बैटन अरुणाचल प्रदेश के मुख्य सचिव को सौंपी गयी और वहां से मुख्य सचिव इस बैटन को लेकर बैनक्वेट हाल के अन्दर गए और इस बैटन को पेडस्टल या इसके स्टैंड पर रख दिया गया और फिर फोटो खींचने और खिंचवाने का सिलसिला शुरू हुआ और उसके बाद अरुणाचल प्रदेश की विभिन्न tribes ने शानदार सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किया
अगले दिन २३ जुलाई को ये बैटन अरुणाचल प्रदेश से निकल कर अपने आगे के सफ़र पर चल पड़ी यानी कि दूसरे राज्य