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Monday, May 9, 2011

अरुणाचल प्रदेश के मुख्य मंत्री का निधन

अरुणाचल प्रदेश के मुख्य मंत्री दोरजी खंडू का हेलीकाप्टर ३० अप्रैल को तवांग से ईटानगर के लिए चला पर ईटानगर नहीं पहुंचा और तवांग से कुछ ही दूरी पर दुर्घटना ग्रस्त हो गया। और इसमें मुख्यमंत्री के साथ ४ अन्य लोगों की मृत्यु हो गयी। जिसमे खंडू जी का शरीर जला नहीं था जबकि दोनों पायलट और उनके पी.एस.ओ. बिलकुल जले हुए थे और जो महिला थी वो भी जली हुई थी । जिस वजह से अनुमान लगाया जा रहा है कि या तो पायलेट ने उन्हें कूदने के लिए कहा या उनके पी.एस.ओ.ने उन्हें नीचे धकेला ताकि वो बच जाए पर चूँकि उन्हें सर मे चोट लगी इस वजह से वो बच नहीं पाए।

मुख्य मंत्री जी के साथ-साथ जो दोनों पायलेट की मृत्यु हुई वो भी बहुत दुखदायी है क्यूंकि कई बार पायलेट कि गलती ना होते हुए भी उन्हें अपनी जान गवानी पड़ती है । कई बार पायलेट के ऊपर दबाव होता है तो कभी मौसम की वजह से क्रेश होता है।

हमें याद है जब हम लोग तवांग हेलीकाप्टर से गए थे और उतरने पर पायलेट को धन्यवाद दिया था तो उन्होंने ने कहा कि हमें नहीं भगवान को धन्यवाद दीजिये।

कितने दुःख की बात है कि तकरीबन ३०००० से ज्यादा आर्मी,इसरो,सुखोई,और चीता हेलीकाप्टर मुख्य मंत्री को खोज पाने मे असमर्थ रहे। और जिस तरफ उन्हें ढूँढने कि कोशिश की जा रही थी वो उससे बिलकुल दूसरी तरफ मिले। सबकी यही दलील है कि भूटान की तरफ उनका chopper जाने की सम्भावना और इसरो की सेट लाईट पिक्चर के वजह से सिर्फ भूटान की तरफ ही उन्हें ढूँढा जा रहा था । कई बार मन मे सवाल उठता है कि जब चीता या सुखोई तवांग से उड़े होंगे तो क्या उन्हें ऊपर से पूरा एरिया नहीं दिखता होगा। या क्या चीन से सटे बार्डर की तरफ देखने की जरुरत क्यूँ नहीं हुई।

तवांग का एरिया काफी दुर्गम सा है और चूँकि उस इलाके मे अक्सर snow fall होता रहता है और काफी ऊंचाई पर स्थित होने के कारण वहां अक्सर ऑक्सीजन की कमी भी हो जाती है। वैसे तवांग मे आर्मी का काफी बड़ा इसटैबलिशमेंट है। क्यूंकि तवांग के एक तरफ भूटान तो दूसरी चीन है।


जब दोरजी खंडू जी का हेलीकाप्टर लापता हुआ तो कुछ घंटे बाद जब भूटान से उनके मिलने की खबर आई तो यहां सभी ने राहत की सांस ली थी पर जब अगले २-३ घंटे मे वो ईटानगर नहीं पहुंचे तब सभी को चिंता होने लगी थी । और फिर अगले ५ दिन तक बस अलग-अलग ख़बरें ही आती रही और आखिरी मे ५ मई को हेलीकाप्टर का मलबा मिलने और उसमे सवार सभी लोगों की मृत्यु की खबर आई।

बेहद अफ़सोस की बात है कि हमारे देश के इतने सारे न्यूज़ चैनल होने के बाद भी इस खबर को कि एक राज्य के मुख्यमंत्री हेलीकाप्टर समेत लापता थे ज्यादा तवजोह नहीं दी गयी। बल्कि ओसामा बिन लादेन के अमेरिका द्वारा मारे जाने की खबर को दिखाया जाता रहा। और आज तक दिखाया जा रहा है। और क्यूँ ना हो आखिर दोरजी खंडू जी की खबर से कोई टी.आर.पी थोड़ी बढती इन चैनेल्स की।

अरुणाचल मे खंडू जी को laughing buddha कहा जाता था क्यूंकि वो हमेशा ही हँसते-मुस्कुराते रहते थे। और ये हमने खुद भी देखा है क्यूंकि यहां ज्यादातर function मे वो मुख्य अथिति होते थे।

अब १० मई को उनका तवांग मे बुद्ध धर्म के अनुसार अंतिम संस्कार किया जाएगा। क्यूंकि वो मोनपा tribe के थे । मोनपा मे अंतिम संस्कार दो तरह से किया जाता है ,एक जिसमे शरीर के १०८ टुकड़े करके नदी मे बहा दिया जाता है और दूसरे मे किसी पहाड़ पर मृतक के शरीर को रख दिया जाता है। और ये सब मोनेसट्री के लामा मरने वाले के अच्छे-बुरे कर्मों के आधार पर तय करते है । वैसे खंडू जी इस प्रथा के खिलाफ थे कि शरीर के टुकड़े नदी मे बहाए किये जाए । उनकी इच्छा थी कि उन्हें या तो दफनाया जाए या फिर हिन्दू रीति से अग्नि को समर्पित कर दिया जाए।

खैर उनके परिवार वालों ने उनका अंतिम संस्कार बुद्ध धर्म के अनुसार करने का निर्णय लिया है। बस भगवान से प्रार्थना है कि उनकी आत्मा को शांति दे।




Thursday, September 9, 2010

Tak-Tsang Monastery यानि टी गुम्पा (तवांग ५ )

जैसा की हमने अपनी पिछली पोस्ट फ्रोजन लेक्स मे कहा था तो चलिए आज माधुरी लेक से आगे चलते है यानी टी .गुम्पा चलते है। माधुरी लेक से बस ५ की.मी.की दूरी पर ये छोटी सी Monastery है और ये Monastery बिलकुल पहाड़ के एक कोने पर बनी है। इस Monastery को Tak-Tsang या Tiger's Den भी कहा जाता है क्यूंकि यहां के लोगों का कहना है कि यहां पर जब इनके गुरु पदमासंभव आये थे तो एक टाइगर ने उनका स्वागत किया था और ये भी माना जाता है कि बहुत समय तक वहां पर टाइगर आते थे हालाँकि अब वहां टाइगर नहीं आते है। :)यहां तक जाने का रास्ता उबड़-खाबड़ तो जरुर था पर जल्दी ही इस रास्ते से होते हुए हम लोग इस टी.गुम्पा पर पहुँच गए। यहां पहुँचते ही चारों ओर से जोर-जोर से हवा की आवाज बिलकुल फ़िल्मी स्टाइल मे सुनाई देने लगी और चारों ओर लगे झंडे फडफडाते हुए खूब जोर-जोर से हवा मे झूमते हुए हिल रहे थे।और जैसा की इन झंडों के लिए कहा जाता है कि ये वातावरण को शुद्ध करते है उस बात को बिलकुल सही साबित कर रहे थे। और इस हवा की वजह से हम सबका ठण्ड के मारे बुरा हाल था जबकि टोपी और जैकट से हम सभी पूरी तरह से लैस थे ,और धूप भी काफी थी
गाडी से उतर कर एक खूबसूरत से गेट से हम लोग अन्दर दाखिल हुए तो सामने ही एक छोटी पर सुन्दर सी Monastery दिखाई दी। और तभी वहां के लामा अपने घर से निकलकर बाहर आये और हम लोगों ने लामा से मुलाकात कर उनसे इस गुम्पा के बारे मे जानकारी चाही। तो उन्होंने सबसे पहले मुख्या प्रार्थना भवन के बायीं ओर के पेड़ को दिखा कर बताया कि ऐसा कहा जाता है कि जब गुरु पदमासंभव यहां आये थे तो उन्होंने इसी पेड़ के नीचे आराम किया था और अपने घोड़े को इसी पेड़ से बाँधा था और अब इस पेड़ को बहुत ही auspicious माना जाता है ।जैसा कि आप इन झंडो को देख कर समझ सकते है। वहां आस-पास २-४ घर दिख रहे थे और Monastery के साथ ही लामा का घर बना हुआ था जहाँ लामा जी अकेले ही रहते है। और बातचीत मे जब उन्होंने इसे टाइगर डेन कहे जाने की बात कही तो अनायास ही हमने उनसे पूछ लिया की क्या आपको रात मे यहां अकेले डर नहीं लगता की कहीं टाइगर ना जाए तो वो बोले कि नहीं डर नहीं लगता है क्यूंकि अब टाइगर क्या रात मे तो इंसान भी नहीं आते है। वैसे दिन मे भी दूर-दूर तक कोई नजर नहीं आता है। :)
इस गुम्पा मे प्रवेश करने के पहले हम लोगों ने जूते उतारे और अन्दर प्रवेश किया तो सामने पदमासंभव की सुनहरी प्रतिमा दिखाई दी और इस प्रतिमा के चारों ओर भगवान बुद्ध के विभिन्न रूप दिखाई दिए और इस प्रतिमा के नीचे का बड़ा दीपक जल रहा था और साथ ही स्टील की छोटी-छोटी कटोरी मे पानी रक्खा था ।यहां पर भी हम लोगों ने सफ़ेद khoda चढ़ाया और जैसे ही इस प्रतिमा के दर्शन करके आगे बढ़ते है तो बायीं ओर दलाई लामा की फोटो नजर आती है।और यहां भी फोटो के नीचे छोटी-छोटी कटोरी मे पानी रक्खा था तो जिज्ञासा वश हमने लामा से पूछा कि इन कटोरियों मे पानी रक्खने का कोई ख़ास कारण है तो इस पर लामा ने बड़ी सादगी से हमे बताया कि रोज सुबह सारी कटोरियों को साफ़ करके वो उनमे पानी भरते है और रोज शाम को सारी कटोरियों का पानी खाली करते है । और फिर हँसते हुए बोले कि भगवान की आराधना ही तो हमारा काम है।( तकरीबन ६०-७० कटोरियों मे पानी रक्खा था )

इस छोटी सी Monastery के अन्दर चक्कर लगा कर हम लोग बाहर आये और Monastery का बाहर से चक्कर लगाया और फोट-शोटो खींची । Monastery के गेट से सामने वाले पहाड़ पर देखने पर पहाड़ की ऊँची चोटी पर कुछ झंडे लगे दिखे पूछने पर पता चला कि वहां पर लोग ध्यान लगाने के लिए जाते है। वैसे अपनी तो वो ऊँची चढ़ाई देखकर ही हिम्मत जवाब दे गयी थी। :)
वहां
लामा से हम लोग बात कर ही रहे थे कि तभी ये दो छोटे से बच्चे आये । यहां के बच्चे बड़े ही जोशीले है । जब भी हम लोगों की गाडी कहीं से गुजरती और अगर वहां कुछ बच्चे होते तो बच्चे पूरे जोश से हाथ हिला-हिला कर wave करते । और कैमरा देख कर तो बच्चे बहुत खुश होते है ।और झट फोटो के लिए pose दे देते है। :)

Monday, August 23, 2010

फ्रोजन लेक्स ऑफ़ तवांग frozen lakes of tawang (तवांग ४)

तवांग की यात्रा के दौरान वहां की फ्रोजन लेक्स के बारे मे पता चला जिसे सुनकर थोडा आश्चर्य भी हुआ की तवांग जैसी जगह मे लेक्स भी है । वहां पर छोटी-बड़ी बहुत सारी तकरीबन १०० से भी ज्यादा लेक्स है पर उनमे से कुछ बहुत मशहूर है जैसे PT Tso (panggang- teng- Tso ) जो की १४ की.मी. की दूरी पर है और वहां से तकरीबन २०-२५ की.मी. आगे जानेपर jong-nga-tseir या shungetser lakeजिसे अब माधुरी लेक भी कहा जाता है ,पड़ती है ।और पूरे ४० -४५ की.मी. के रास्ते मे ढेरों लेक्स पड़ती है जिन्हें देखकर मन खुश होता रहता है। हालाँकि रास्ता बहुत खराब है और बहुत ही दुर्गम से पहाड़ है पर थोड़ी-थोड़ी बर्फ पहाड़ों पर जमी हुई, याक , लेक्स और रास्ते भर आर्मी की गाड़ियों को देखते हुए वो खराब रास्ता भी पार हो जाता है ।पूरे रास्ते बस आर्मी के कैंप और बंकर नजर आते है।

तो अगले दिन सुबह सुबह वहां जाने का कार्यक्रम बनाया गया और साथ मे खाना-पानी वगैरा भी पैक करा गया क्यूंकि इन लेक्स पर कहीं भी कुछ भी खाने के लिए नहीं मिलता है। और रास्ते मे कुछ मिलने का सवाल ही नहीं है। खैर सुबह २ गाड़ियों (टाटा सुमु ) मे हम लोग चले ।

तो सबसे आर्मी की एक चेक पोस्ट पड़ी और वहां पर एंट्री करके आगे चले तो ५ की.मी.जाने पर आर्मी की एक और चेक पोस्ट हर मैदान फ़तेह मराठा ग्राउंड पड़ी जहाँ एक बार फिर से एंट्री करनी पड़ी और फिर वहां से आगे बढ़ने पर पेड़ों और पहाड़ों पर जमी बर्फ और इधर-उधर घूमते हुए याक नजर आये ।वैसे वहां के लोगों ने बताया की इस पूरे रास्ते बहुत सुन्दर orchids दिखते है जिनकी वजह से रास्ता बहुत खूबसूरत लगता है पर चूँकि उस समय सीजन नहीं था इसलिए हम orchids नहीं देख पाए।
६ की.मी. और आगे जाने पर PT Tso lake पड़ी और जब हम लोग कार से उतरे तो बूडूम - बूडूम की आवाज आई ।और जब लेक के पास पहुंचे तो बर्फ चटकने की आवाजें बिलकुल साफ़ सुनाई देनी लगी। और इस बूडूम-बूडूम मे एक अजीब सी गूँज सी हो रही थी। जिसे सुनकर बहुत रोमांच सा हो रहा था। लेक के इस तरफ बौद्ध धर्म के झंडे जिन्हें माना जाता है की ये हवा को और आस-पास के माहौल को शुद्ध करते है वो लगे हुए थे और लेक के दूसरी तरफ पहाड़ थे जिनमे कुछ हरे रंग के और कुछ लाल रंग के पेड़ और उन पर थोड़ी-थोड़ी बर्फ बड़ी अलग से लग रही थी


PT Tso पर कुछ फोटो वगैरा खींच कर हम लोग आगे चल पड़े तो थोड़ी दूर पर एक और आर्मी की चेक पोस्ट पड़ी।और यहां से एक रास्ता कट कर बूमला जाता है जो आगे चीन के बार्डर तक जाता है। खैर हम लोग बूमला ना जाकर आगे बढे और ऊँचे-नीचे उबड़-खाबड़ रास्ते से होते हुए shungetser lake यानी माधुरी लेक की तरफ बढ़ते रहे ।रास्ते भर lakes तो बहुत दिखी पर उनमे से कुछ lakes आधी फ्रोजन यानी जमी हुई थी तो आधी मे पानी दिख रहा था।जैसे-जैसे माधुरी लेक के पास पहुँचने लगे तो सड़क के दोनों ओर और सड़क पर भी बर्फ दिखाई पड़ी। और इस माधुरी लेक के लिए कहा जाता है ये लेक १९७३ मे आई बाढ़ का परिणाम है। और हाँ इसे माधुरी लेक क्यूँ कहा जाता है ये तो ताया ही नहींवो क्या है ना की फ़िल्म कोयला की शूटिंग के लि माधुरी और शाह रूख खान यहां आये थे और बस उसके बाद से इस लेक को माधुरी लेक कहा जाने लगा।( ये माधुरी लेक की ऊपर से खींची हुई फोटो है )इस लेक पर पहुंचकर गाडी से उतरने पर पहले तो कुछ सेना के जवान दिखाई दिए और फिर हम लोग एक छोटे से लकड़ी के पुल से चलकर कच्चे-पक्के रास्ते से होते हुए इस फ्रोजन माधुरी लेक तक पहुँच गए।लेक के चारों और काले पत्थरों के पहाड़ दिखाई दे रहे थे और लेक के बीच-बीच मे सूखे हुए पेड़ के तने दिखाई दे रहे थे। और लेक पर पैर रखते ही एक अदभुद सा रोमांच हुआ पर हम लोग बहुत आगे तक नहीं गए पर हम लोगों के साथ गए हुए कुछ लोग चल कर लेक के बिलकुल बीच मे पहुँच गए थे और हमें भी कह रहे थे की मैडम डरिये मत ,आप लोग भी आ जाइए,पर हमारी हिम्मत नहीं हो रही थी (अरे भाई टी.वी.मे देखा है की किस तरफ अचानक ही बर्फ टूट जाती है ) पर जैसे ही बर्फ मे से ब्डूम की आवाज आई वो सभी चिल्लाते हुए दौड़ते हुए वापिस हम लोगों की तरफ भागे।फिर वहां बर्फ पर थोड़ी देर रूक कर हम लोग वापिस लौट कर बाहर आ गए और अपने साथ लाये हुए ब्रेड पकोड़ा ,सैंडविच ,पकोड़े, चाय,पेप्सी वगैरा खाया -पिया और एक बार फिर गाडी मे वापसी की यात्रा शुरू की।वैसे यहां पर एक रेस्तौरेंट बना हुआ है पर चलता कम है क्यूंकि वहां ज्यादा लोग जाते नहीं है। (उस दिन तो बंद ही था ) :(और जब हम लोग खा-पी रहे थे तो वहां ३-४ doggi आ गए थे ।और बहुत शांति से बैठ गए तो हम लोगों ने उनको भी खाना खिलाया। वहां से हम लोग २ बजे तक निकल लिए क्यूंकि वहां पर अँधेरा बहुत जल्दी हो जाता है और रास्ते मे लाईट होती नहीं है और रास्ते भी कुछ ज्यादा अच्छे नहीं है। और रास्ते मे कब क्या मुसीबत आ जाए कहा नहीं जा सकता।
वो ऐसा हम इसलिए कह रहे है क्यूंकि जैसे हम ही लोग वापिस लौटने लगे तो ४-५ की.मी.बाद ही बीच सड़क मे एक आर्मी का ट्रक कुछ इस तरह से खराब हुआ था और सड़क पर खड़ा था की ना तो कोई गाडी आ सकती थी और ना ही जा सकती थी। और वो लोग आराम से गाडी बनाने मे लगे थे। १५-२० मिनट तक हम लोग खड़े रहे फिर हम लोगों ने ड्राईवर को कहा कि जाकर बोलो कि ट्रक को एक तरफ साईड मे कर ले । पर ट्रक को हिलाना भी आसान नहीं था क्यूंकि चढ़ाई पर ट्रक खराब हुआ था।और ड्राईवर के कहने पर पहले आर्मी वालों को समझ भी नहीं आया । उन्हें लगा कि क्या बेवकूफी की बात कर रहे है। पर खैर आधे घंटे बाद उनकी मदद के लिए एक और ट्रक आया और फिर उन लोगों ने ट्रक को थोडा धक्का देकर एक साइड मे किया और फिर हम लोग वहां से निकल पाए।इस lake से ५ की.मी. आगे टी. गुम्पा (Tak-Tsang Monastery) पड़ती है । उसका जिक्र अगली पोस्ट मे।

Friday, May 21, 2010

तवांग यात्रा (३) तवांग वार मेमोरिअल (tawang war memorial)

तवांग मे जैसे ही प्रवेश करते है तो हर तरफ भारतीय सेना के जवान ,सेना की कारें,ट्रक,वगैरा बहुत दिखाई देते है क्यूंकि तवांग चीन और भारत के बार्डर का डिस्ट्रिक्ट है। १९६२ मे जब चीन ने (sino-india war) भारत पर आक्रमण किया था और चीनी सैनिक भारत मे प्रवेश करने की कोशिश कर रहे थे उस समय तवांग मे तैनात भारतीय सैनिकों ने अपूर्व जौहर और हिम्मत से चीनी सैनिकों का सामना किया था और उन्हें भारत मे प्रवेश करने से रोका था।इस लड़ाई मे २४२० भारतीय सेना के जवान शहीद हो गए थे और इन्ही शहीदों की याद मे ये memorial बनाया गया है। ये memorial तवांग शहर से १ कि.मी.की दूरी पर है और यहां तक जाने मे रास्ते मे दोनों तरफ सेना के शिविर और सड़क के दोनों ओर बहुत सारे बोर्ड ,झंडे और मूर्तियाँ अलग-अलग रेजिमेंट के बहादुर सैनिकों की दिखाई देती है। और इस १ कि.मी.के रास्ते मे सेना के जवान आते-जाते हुए भी दिखाई देते है।
इस memorial का निर्माण १५ अगस्त १९९८ मे शुरू हुआ था और २ नवम्बर १९९९ को इसे उन २४२० शहीदों को समर्पित किया गया जिन्होंने चीनी सैनिकों से लड़ते हुए अपनी जान अपने देश पर कुर्बान कर दी थी। इस memorial की ख़ास बात ये है कि ये तवांग के तकरीबन पूरे शहर से दिखाई देता है।
जैसे ही इस war memorial के गेट से प्रवेश करते है तो दाहिनी ओर एक बोफोर्स तोप दिखाई पड़ती है और इसी के पास कार पार्किंग भी है। यहां से थोडा आगे बढ़ने पर भगवान बुद्ध की सफ़ेद मूर्ति बनी हुई है। यहां पर जैसे ही कार से उतरते है तो सामने सीढियां दिखाई देती है और इन सीढ़ियों के प्रवेश द्वार पर खड़े होकर देखने पर यहां बना ४० फीट ऊँचा स्तूप दिखाई देता है ।

इस
war memorial मे बुद्ध धर्म की झलक साफ़ दिखाई पड़ती है -प्रवेश द्वार और ऊपर भी । सीढ़ियों से ऊपर जाने पर धर्म चक्र (monestary जैसे )दिखाई पड़ते है । यहां स्तूप के चारों ओर दीवारों पर उस युद्ध मे शहीद हुए सभी जवानों के नाम उनकी रेजिमेंट के साथ लिखे हुए है ।
इस war memorial मे ऊपर की तरफ भारतीय झंडे के साथ साथ सभी रेजिमेंट के झंडे लगे हुए है । रोज सुबह सूर्योदय के साथ इन्हें फहराया जाता है । और हर रोज शाम ५ बजे जब सूरज ढलने लगता है यानी सूर्यास्त के समय इन सभी झंडों को बिगुल की धुन के साथ उतारा जाता है और इसे देखना भी अपने आप मे एक अनुभव है।इसका विडियो you tube पर लगाया हुआ है ।


इस स्मारक के चारों पत्थर लगे हुए है जिनपर शहीदों के लिए लिखा हुआ है कि किस तरह उन्होंने अपनी जान की परवाह ना करते हुए देश के प्रति अपना फर्ज निभाया था।
थोडा और आगे बढ़ने पर एक कमरे मे सूबेदार जोगिन्दर सिंह जी की प्रतिमा बनी है जिसके नीचे एक रीथ रक्खा हुआ है और साथ ही वहां पर राइफल्स और शहीद हुए जवानों की अस्थियाँ भी रक्खी हुई है। दीवार पर मेड़ेल्स लगे हुए है और इस लड़ाई के बारे मे लिखा हुआ है। जोगिन्दर सिंह जी की मूर्ति के नीचे किस बहादुरी और अदम्य साहस के साथ उन्होंने चीनी सेना से लड़ाई की लिखा हुआ है और जिसे पढ़कर सिर अपने आप उनकी शान मे झुक जाता है।यहां से आगे बढ़ने पर एक और कमरा पड़ता है जिसमे उस समय इस्तेमाल की गयी राइफल्स और गोलियां रक्खी है। और यहां पर दीवारों मे उस समय लड़ाई की फोटो लगी हुई है। साथ ही एक नक्शा भी लगा हुआ है। जिसके माध्यम से उस समय जैसे-जैसे लड़ाई आगे बढ़ी थी उसे दर्शाया गया है। जिसे पढ़कर और देख कर अपने देश के लिए जान कुबान करने वाले शहीदों पर नाज होता है ।

war memorial से बाहर आने पर बायीं ओर गिफ्ट शॉप पड़ती है जहाँ से हम लोगों ने इस war memorial के सोविनियर खरीदे। और वापिस गेस्ट हाउस आ गए।

Friday, May 14, 2010

तवांग यात्रा (२)(tawang)

चलिए अपनी तवांग यात्रा को आगे बढ़ाते है । तकरीबन साढ़े बारह बजे हम लोग तवांग पहुँच गए । जब हेलिकॉप्टर तवांग के हैलीपैड पर उतरा और हम लोग बाहर निकलने लगे तो कैप्टेन ने हम लोगों को हिदायत दी कि चूँकि आप लोग पहली बार तवांग आये है इसलिए एक दम से बहुत ज्यादा घूमने या ऊपर-नीचे पहाड़ों पर मत जाइएगा।क्यूंकि तवांग उंचाई पर है और यहां अक्सर ऑक्सीजन की कमी हो जाती है जिससे सांस की तकलीफ हो सकती है।तो इसलिए थोडा संभल कर रहिएगा। कैप्टेन को उनकी इस हिदायत के लिए धन्यवाद कह कर हम लोग गेस्ट हाउस की तरफ चल पड़े। हालंकि वहां सड़क ठीक -ठाक है और वहां के लोगों का कहना है कि चूँकि वहां बर्फ बहुत गिरती है इसलिए सड़क खराब होती रहती है

खैर गेस्ट हाउस पहुंचकर चाय पी और फिर थोडा देर आराम करके घूमने का प्रोग्राम बनाया गया। और सबसे पहले वहां की ganden namgyal lhatse जिसे तवांग monestary भी कहते है उस को देखने का तय हुआ । इस monestary तक जाने के २ रास्ते है ।गाडी से जाने पर एक पूरे पहाड़ का चक्कर लगाकर वहां पहुँचते है । और दूसरा रास्ता सीढ़ी से जाने का है। खैर हम लोग कार से गए और बस ५-७ मिनट की ड्राइव के बाद हम लोग monestary मे थे।पर लौटने मे सीढ़ी से लौटे ।

इस
सारे रास्ते मे लामा भी दिखाई देते है। लामा लोद्रो ग्याम्त्सो ( lama lodroe gyamtso) ने १६८१ मे इस monestary की स्थापना की थी।1९९७ मे दोबारा इस monestary का निर्माण हुआ और इसे जनता को समर्पित किया गया

NDTV ने इस monestary को spiritual wonder of india कहा है।ये monestary काफी बड़ी है और ये छठें लामा Tsangyang Gyatso की जन्मस्थली होने के कारण काफी महत्वपूर्ण मानी जाती है। ।इसमें लामा लोगों के लिए घर,स्कूल ,लाइब्ररी,है और एक museum भी है जो काफी अच्छा है। और जिससे पुराने इतिहास का पता चलता है।तवांग monestary ऊंचाई पर स्थित होने के कारण वहां से तवांग शहर का और तवांग शहर से इस monestary का नजारा काफी सुन्दर दिखाई देता है। (ये छोटे लामा अचानक कहीं से गए थे। )
monestary मे पहुँचते ही वहां व्याप्त शांति से मन प्रसन्न हो गया था। monestary काफी खाली-खाली लग रही थी क्यूंकि एक तो दोपहर का समय था और दूसरे यहां पर लामा लोगों के लिए जो स्कूल था वो बंद हो चुका था और सभी लामा अपने-अपने घरों मे थे। हाँ हम लोगों की गाडी रुकने कुछ लामा जिज्ञासा वश वहां जरुर आ गए थे।

खैर वहां के २ लामा हम लोगों को monestary दिखाने के लिए हम लोगों के साथ चले।( ये लामा हिंदी के साथ- साथ इंग्लिश भी बहुत अच्छी बोल रहे थे)कुछ १०-१२ सीढियां उतर जब मुख्य प्रांगन मे पहुंचे तो चारों ओर नजर दौडाने पर monestary के सभी भवन और इमारतें सफ़ेद ,नीले,लाल और भूरे रंग मे थी और सभी मे सुन्दर और कलर फुल चित्रकारी दिखाई दी ।और बायीं ओर पुराना प्रार्थना भवन दिखाई देता है जो अब खाली रहता है और दाहिनी ओर दिए जलाने का भवन दिखाई देता है। (house of offering butter lamp)


मुख्य
ईमारत तीन मंजिला है जिसमे सबसे नीचे की मंजिल पर मुख्य प्रार्थना भवन जिसे दुखांग (Dukhang) कहते है।और सबसे ऊपर की मंजिल १४वें दलाई लामा के रहने के लिए है। वो जब भी तवांग जाते है तो इसी monestary मे ठहरते है। (सबसे ऊपर वाली फोटो )

हम लोग प्रार्थना भवन मे पहुंचे तो मुख्य द्वार और उसके आस-पास की चित्रकारी देखने लायक थी । इस प्रार्थना भवन मे कई चौकोर खम्बे है और इन खम्बों मे और भवन के अन्दर भी सुन्दर चित्रकारी की हुई है। भवन की दीवारों पार भगवान बुद्ध के १०० रूपों को दिखाया गया है।
साथ-साथ यहां पर बौद्ध धर्म के अन्य देवी-देवता के साथ चंगेज खान को भी पेंटिंग के जरिये दिखाया गया है।
यहां पर हजार हाथों वाली देवी guanyin की प्रतिमा भी देखी। अवलोकितेश्वर यानी बुद्धा को इनका ही अवतार मानते है।
भवन
के प्रमुख द्वार से प्रवेश करने पर सामने सुनहरे रंग की भगवान बुद्ध की प्रतिमा लाल रंग के वस्त्र मे नजर आई । और बुद्ध की प्रतिमा के ठीक नीचे १४वें दलाई लामा की फोटो नजर आई।



इसके नीचे एक बहुत बड़ा घी का लैम्प दिखा जो सारे समय जलता रहता है।monestary मे बुद्ध की प्रतिमा पर सफ़ेद सिल्की कपडा जिसपर बौद्ध धर्म के ८ शुभ सिम्बल बने होते है और बौद्ध धर्म का मन्त्र लिखा होता है उसे चढ़ाया जाता है।और चूँकि प्रतिमा काफी ऊँची है इसलिए इसे रोल करके ऊपर भगवान बुद्ध की तरफ फेंका जाता है।

यहां पर monks यानी लामा लोगों के रहने के लिए घर बने है जहाँ एक घर मे छोटे और बड़े लामा एक परिवार की तरह रहते है ।इनके घर मे जाने के लिए लकड़ी की सीढ़ी होती है । वैसे घर मे खाना बनाने के लिए गैस और कुकर वगैरा होते है। जरुरत का सभी सामान होता है। पर बाकी सामान कम से कम ही होता है।और हर घर मे एक बुखारी होती है जिससे कमरे को गरम रक्खा जाता है।यहां के सबसे वृद्ध लामा से भी हम लोग मिले।
और फिर यहां पर बने museum को देखने भी गए। museum को घूमना और देखना भी काफी रोचक रहा। जहाँ नीचे की मंजिल पर वस्त्र ,वाध यन्त्र ,ब्रौकेड्स,gyetongpa सुनहरी पांडुलिपि ,बर्तन और अनेकों चीजों के साथ-साथ १००० साल पुराना हाथी दांत (tusk) भी देखा। :)


और
ऊपर की मंजिल पर बड़े-बड़े बर्तन जिनमे कभी खाना बना करता था और चाय बनाने का एक ख़ास तरह का बर्तन वगैरा भी देखे। जिसे आज भी तवांग मे चाय बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है ।
स्कूल और लाइब्ररी नहीं देख पाए क्यूंकि स्कूल बंद हो चुका था। और हाँ इस monestary मे कैमरे के अलग-अलग चार्ज लगते है जैसे still camera का २० रुपया ,video camera के १०० रूपये और movie camera का ५०० रूपये लगता है।

खैर
अगली बार जब जायेंगे तब देखेंगे।आज की यात्रा अब यही ख़त्म कर रहे है। आप लोग भी थक गए होंगे। :)

Thursday, April 29, 2010

तवांग यात्रा --१ !(tawang)


तवांग अरुणाचल प्रदेश का एक डिस्ट्रिक्ट है और एक खूबसूरत पर्यटन स्थल भी है । तवांग जाने के लिए आसाम से होकर जाते है फिर चाहे सड़क के रास्ते जाए या फिर हेलीकाप्टर से जाए। भूटान और चीन तवांग के सीमावर्ती देश है।वैसे नवम्बर-दिसंबर मे चीनी सैनिकों की इसके बोर्डर के पास पहुँचने की खबर तो आप लोगों ने भी देखी ही होगी। जब हेलीकाप्टर से जाते है तो भूटान को cross करते है।खैर जब हम लोगों ने तवांग जाने का कार्यक्रम बनाया तो ये सोचा गया कि एक तरफ से हेलीकाप्टर से जाया जाए और लौटने मे सड़क के रास्ते आया जाए जिससे दोनों तरफ का मजा लिया जा सके। तो जनवरी मे जब यहां मौसम काफी अच्छा था तो हम लोगों ने तवांग के लिए पवनहंस हेलीकाप्टर का टिकट लिया (३ हजार)प्रति व्यक्ति । वैसे चाहे गौहाटी से जाए तब भी इतना ही किराया लगता है।
ईटानगर से गौहाटी का रास्ता १ घंटे १० मिनट मे पूरा किया । और वहां से गौहाटी के यात्री उतर गए और आधे घंटे तक हेलिकॉप्टर गौहाटी मे रुका रहा और फिर वहां से ३-४ और लोग तवांग जाने के लिए चढ़े। २४ सीट वाले हेलिकॉप्टर मे सिर्फ ८ यात्री और ५ crew member तवांग के लिए चले।गौहाटी से तवांग की दूरी १ घंटे मे पूरी करते है। जिसमे पहले २० मिनट हेलिकॉप्टर आसाम और फिर अगले २० मिनट भूटान और उसके बाद अगले २० मिनट अरुणाचल प्रदेश के ऊपर से गुजरता है
क्यूंकि जब हेलिकॉप्टर गौहाटी से दोबारा अपनी उड़ान भरता है तो कॉकपिट का दरवाजा खुला ही रहता है। जिससे सामने का पूरा view दिखता रहता है। भूटान cross करने मे जो २० मिनट लगते है उस दौरान रोमांच और डर दोनों की मिली जुली सी फीलिंग आती है। सांस अटकी रहती है क्यूंकि उस बीच मे हेलीकाप्टर के कॉकपिट का दरवाजा खुला रहता है और सामने दो पहाड़ों के बीच से हेलीकाप्टर गुजरता हुआ दिखता रहता है और नीचे खाई दिखती रहती है। और हवा के दबाव की वजह से हेलीकाप्टर थोड़ा-थोड़ा हिलता -डुलता सा चलता है। और उनका एक crew member emergency button हाथ मे पकडे रहता है जिसे देख देख कर थोड़ा और डर लगता रहता है।

जब
हेलीकाप्टर भूटान से गुजरता है तो दाहिनी ओर सबसे पुरानी मोनेसट्री भी दिखाई पड़ती है। पर चूँकि हम बायीं ओर बैठे थे इसलिए सोचा था कि भूटान मे प्रवेश करते ही दाहिनी ओर चले जायेंगे पर बाद मे हिम्मत नहीं हुई।पर हाँ अगली बार तवांग जाने पर उस मोनेसट्री की फोटो जरुर खींचेंगे।
तवांग तकरीबन ८ हजार फीट की ऊंचाई पर है और यहां ज्यादातर सर्दी का मौसम रहता है, और अक्सर बर्फ भी गिरती रहती है।जून,जुलाई और अगस्त मे यहाँ खूब बारिश होती है और सितम्बर से नवम्बर का समय सबसे अच्छा होता है यानी की सुहावना मौसम होता है और यहां अक्टूबर मे tourisim festival होता है। और नवम्बर से मार्च तक का समय जाड़े का होता है। तवांग की मुख्य नदी का नाम तवांग चू (tawang chu) है ।और यहां की मुख्य tribe मोनपा (monpa)है। और यहां की औरतें जो तिब्बती स्टाइल का गाऊन पहनती है उसे चुपा (chupa) और आदमी जो तिब्बती स्टाइल की शर्ट पहनते है उसे तोह-थुंग (toh-thung)कहते है। और ये लोग पारंपरिक स्टाइल का जो coat पहनते है उसे खंजर (khanjar)कहते है। और यहां के लोग एक ख़ास तरह की कैप पहनते है जिसे गामा शोम ( ngama-shom ) कहते है और ये याक (yak) के बालों से बनी होती है।

यूँ तो यहां पर कई त्यौहार मनाये जाते है जिनमे लोसर (losar)जिसके बारे मे हमने पहले mamtatv पर लिखा था वो मुख्य त्यौहार है जिसे नए साल के रूप मे बनाया जाता है। और तोरग्या (torgya) जिसे बुराइयों को और किसी भी तरह की प्राकृतिक आपदा को दूर रखने के लिए मनाया जाता है। ये त्यौहार जनवरी मे मनाया जाता है।और यहां का lion dance भी काफी मशहूर और देखने लायक होता है।

नोट--जैसे हिंदी फिल्मों मे दिखाते है कि हेलीकाप्टर मे लोग बड़े आराम से बात करते है या गाना गाते है पर असल मे ऐसा नहीं होता है। हेलीकाप्टर मे इतनी आवाज होती है कि कुछ ठीक से सुनाई भी नहीं देता है और बिना headphone के बैठा ही नहीं जाता है। :)

ये सारी फोटो हेलीकाप्टर से ली है सिर्फ पहली और आखिरी दो फोटो को छोड़ कर