Friday, May 21, 2010

तवांग यात्रा (३) तवांग वार मेमोरिअल (tawang war memorial)

तवांग मे जैसे ही प्रवेश करते है तो हर तरफ भारतीय सेना के जवान ,सेना की कारें,ट्रक,वगैरा बहुत दिखाई देते है क्यूंकि तवांग चीन और भारत के बार्डर का डिस्ट्रिक्ट है। १९६२ मे जब चीन ने (sino-india war) भारत पर आक्रमण किया था और चीनी सैनिक भारत मे प्रवेश करने की कोशिश कर रहे थे उस समय तवांग मे तैनात भारतीय सैनिकों ने अपूर्व जौहर और हिम्मत से चीनी सैनिकों का सामना किया था और उन्हें भारत मे प्रवेश करने से रोका था।इस लड़ाई मे २४२० भारतीय सेना के जवान शहीद हो गए थे और इन्ही शहीदों की याद मे ये memorial बनाया गया है। ये memorial तवांग शहर से १ कि.मी.की दूरी पर है और यहां तक जाने मे रास्ते मे दोनों तरफ सेना के शिविर और सड़क के दोनों ओर बहुत सारे बोर्ड ,झंडे और मूर्तियाँ अलग-अलग रेजिमेंट के बहादुर सैनिकों की दिखाई देती है। और इस १ कि.मी.के रास्ते मे सेना के जवान आते-जाते हुए भी दिखाई देते है।
इस memorial का निर्माण १५ अगस्त १९९८ मे शुरू हुआ था और २ नवम्बर १९९९ को इसे उन २४२० शहीदों को समर्पित किया गया जिन्होंने चीनी सैनिकों से लड़ते हुए अपनी जान अपने देश पर कुर्बान कर दी थी। इस memorial की ख़ास बात ये है कि ये तवांग के तकरीबन पूरे शहर से दिखाई देता है।
जैसे ही इस war memorial के गेट से प्रवेश करते है तो दाहिनी ओर एक बोफोर्स तोप दिखाई पड़ती है और इसी के पास कार पार्किंग भी है। यहां से थोडा आगे बढ़ने पर भगवान बुद्ध की सफ़ेद मूर्ति बनी हुई है। यहां पर जैसे ही कार से उतरते है तो सामने सीढियां दिखाई देती है और इन सीढ़ियों के प्रवेश द्वार पर खड़े होकर देखने पर यहां बना ४० फीट ऊँचा स्तूप दिखाई देता है ।

इस
war memorial मे बुद्ध धर्म की झलक साफ़ दिखाई पड़ती है -प्रवेश द्वार और ऊपर भी । सीढ़ियों से ऊपर जाने पर धर्म चक्र (monestary जैसे )दिखाई पड़ते है । यहां स्तूप के चारों ओर दीवारों पर उस युद्ध मे शहीद हुए सभी जवानों के नाम उनकी रेजिमेंट के साथ लिखे हुए है ।
इस war memorial मे ऊपर की तरफ भारतीय झंडे के साथ साथ सभी रेजिमेंट के झंडे लगे हुए है । रोज सुबह सूर्योदय के साथ इन्हें फहराया जाता है । और हर रोज शाम ५ बजे जब सूरज ढलने लगता है यानी सूर्यास्त के समय इन सभी झंडों को बिगुल की धुन के साथ उतारा जाता है और इसे देखना भी अपने आप मे एक अनुभव है।इसका विडियो you tube पर लगाया हुआ है ।


इस स्मारक के चारों पत्थर लगे हुए है जिनपर शहीदों के लिए लिखा हुआ है कि किस तरह उन्होंने अपनी जान की परवाह ना करते हुए देश के प्रति अपना फर्ज निभाया था।
थोडा और आगे बढ़ने पर एक कमरे मे सूबेदार जोगिन्दर सिंह जी की प्रतिमा बनी है जिसके नीचे एक रीथ रक्खा हुआ है और साथ ही वहां पर राइफल्स और शहीद हुए जवानों की अस्थियाँ भी रक्खी हुई है। दीवार पर मेड़ेल्स लगे हुए है और इस लड़ाई के बारे मे लिखा हुआ है। जोगिन्दर सिंह जी की मूर्ति के नीचे किस बहादुरी और अदम्य साहस के साथ उन्होंने चीनी सेना से लड़ाई की लिखा हुआ है और जिसे पढ़कर सिर अपने आप उनकी शान मे झुक जाता है।यहां से आगे बढ़ने पर एक और कमरा पड़ता है जिसमे उस समय इस्तेमाल की गयी राइफल्स और गोलियां रक्खी है। और यहां पर दीवारों मे उस समय लड़ाई की फोटो लगी हुई है। साथ ही एक नक्शा भी लगा हुआ है। जिसके माध्यम से उस समय जैसे-जैसे लड़ाई आगे बढ़ी थी उसे दर्शाया गया है। जिसे पढ़कर और देख कर अपने देश के लिए जान कुबान करने वाले शहीदों पर नाज होता है ।

war memorial से बाहर आने पर बायीं ओर गिफ्ट शॉप पड़ती है जहाँ से हम लोगों ने इस war memorial के सोविनियर खरीदे। और वापिस गेस्ट हाउस आ गए।

Friday, May 14, 2010

तवांग यात्रा (२)(tawang)

चलिए अपनी तवांग यात्रा को आगे बढ़ाते है । तकरीबन साढ़े बारह बजे हम लोग तवांग पहुँच गए । जब हेलिकॉप्टर तवांग के हैलीपैड पर उतरा और हम लोग बाहर निकलने लगे तो कैप्टेन ने हम लोगों को हिदायत दी कि चूँकि आप लोग पहली बार तवांग आये है इसलिए एक दम से बहुत ज्यादा घूमने या ऊपर-नीचे पहाड़ों पर मत जाइएगा।क्यूंकि तवांग उंचाई पर है और यहां अक्सर ऑक्सीजन की कमी हो जाती है जिससे सांस की तकलीफ हो सकती है।तो इसलिए थोडा संभल कर रहिएगा। कैप्टेन को उनकी इस हिदायत के लिए धन्यवाद कह कर हम लोग गेस्ट हाउस की तरफ चल पड़े। हालंकि वहां सड़क ठीक -ठाक है और वहां के लोगों का कहना है कि चूँकि वहां बर्फ बहुत गिरती है इसलिए सड़क खराब होती रहती है

खैर गेस्ट हाउस पहुंचकर चाय पी और फिर थोडा देर आराम करके घूमने का प्रोग्राम बनाया गया। और सबसे पहले वहां की ganden namgyal lhatse जिसे तवांग monestary भी कहते है उस को देखने का तय हुआ । इस monestary तक जाने के २ रास्ते है ।गाडी से जाने पर एक पूरे पहाड़ का चक्कर लगाकर वहां पहुँचते है । और दूसरा रास्ता सीढ़ी से जाने का है। खैर हम लोग कार से गए और बस ५-७ मिनट की ड्राइव के बाद हम लोग monestary मे थे।पर लौटने मे सीढ़ी से लौटे ।

इस
सारे रास्ते मे लामा भी दिखाई देते है। लामा लोद्रो ग्याम्त्सो ( lama lodroe gyamtso) ने १६८१ मे इस monestary की स्थापना की थी।1९९७ मे दोबारा इस monestary का निर्माण हुआ और इसे जनता को समर्पित किया गया

NDTV ने इस monestary को spiritual wonder of india कहा है।ये monestary काफी बड़ी है और ये छठें लामा Tsangyang Gyatso की जन्मस्थली होने के कारण काफी महत्वपूर्ण मानी जाती है। ।इसमें लामा लोगों के लिए घर,स्कूल ,लाइब्ररी,है और एक museum भी है जो काफी अच्छा है। और जिससे पुराने इतिहास का पता चलता है।तवांग monestary ऊंचाई पर स्थित होने के कारण वहां से तवांग शहर का और तवांग शहर से इस monestary का नजारा काफी सुन्दर दिखाई देता है। (ये छोटे लामा अचानक कहीं से गए थे। )
monestary मे पहुँचते ही वहां व्याप्त शांति से मन प्रसन्न हो गया था। monestary काफी खाली-खाली लग रही थी क्यूंकि एक तो दोपहर का समय था और दूसरे यहां पर लामा लोगों के लिए जो स्कूल था वो बंद हो चुका था और सभी लामा अपने-अपने घरों मे थे। हाँ हम लोगों की गाडी रुकने कुछ लामा जिज्ञासा वश वहां जरुर आ गए थे।

खैर वहां के २ लामा हम लोगों को monestary दिखाने के लिए हम लोगों के साथ चले।( ये लामा हिंदी के साथ- साथ इंग्लिश भी बहुत अच्छी बोल रहे थे)कुछ १०-१२ सीढियां उतर जब मुख्य प्रांगन मे पहुंचे तो चारों ओर नजर दौडाने पर monestary के सभी भवन और इमारतें सफ़ेद ,नीले,लाल और भूरे रंग मे थी और सभी मे सुन्दर और कलर फुल चित्रकारी दिखाई दी ।और बायीं ओर पुराना प्रार्थना भवन दिखाई देता है जो अब खाली रहता है और दाहिनी ओर दिए जलाने का भवन दिखाई देता है। (house of offering butter lamp)


मुख्य
ईमारत तीन मंजिला है जिसमे सबसे नीचे की मंजिल पर मुख्य प्रार्थना भवन जिसे दुखांग (Dukhang) कहते है।और सबसे ऊपर की मंजिल १४वें दलाई लामा के रहने के लिए है। वो जब भी तवांग जाते है तो इसी monestary मे ठहरते है। (सबसे ऊपर वाली फोटो )

हम लोग प्रार्थना भवन मे पहुंचे तो मुख्य द्वार और उसके आस-पास की चित्रकारी देखने लायक थी । इस प्रार्थना भवन मे कई चौकोर खम्बे है और इन खम्बों मे और भवन के अन्दर भी सुन्दर चित्रकारी की हुई है। भवन की दीवारों पार भगवान बुद्ध के १०० रूपों को दिखाया गया है।
साथ-साथ यहां पर बौद्ध धर्म के अन्य देवी-देवता के साथ चंगेज खान को भी पेंटिंग के जरिये दिखाया गया है।
यहां पर हजार हाथों वाली देवी guanyin की प्रतिमा भी देखी। अवलोकितेश्वर यानी बुद्धा को इनका ही अवतार मानते है।
भवन
के प्रमुख द्वार से प्रवेश करने पर सामने सुनहरे रंग की भगवान बुद्ध की प्रतिमा लाल रंग के वस्त्र मे नजर आई । और बुद्ध की प्रतिमा के ठीक नीचे १४वें दलाई लामा की फोटो नजर आई।



इसके नीचे एक बहुत बड़ा घी का लैम्प दिखा जो सारे समय जलता रहता है।monestary मे बुद्ध की प्रतिमा पर सफ़ेद सिल्की कपडा जिसपर बौद्ध धर्म के ८ शुभ सिम्बल बने होते है और बौद्ध धर्म का मन्त्र लिखा होता है उसे चढ़ाया जाता है।और चूँकि प्रतिमा काफी ऊँची है इसलिए इसे रोल करके ऊपर भगवान बुद्ध की तरफ फेंका जाता है।

यहां पर monks यानी लामा लोगों के रहने के लिए घर बने है जहाँ एक घर मे छोटे और बड़े लामा एक परिवार की तरह रहते है ।इनके घर मे जाने के लिए लकड़ी की सीढ़ी होती है । वैसे घर मे खाना बनाने के लिए गैस और कुकर वगैरा होते है। जरुरत का सभी सामान होता है। पर बाकी सामान कम से कम ही होता है।और हर घर मे एक बुखारी होती है जिससे कमरे को गरम रक्खा जाता है।यहां के सबसे वृद्ध लामा से भी हम लोग मिले।
और फिर यहां पर बने museum को देखने भी गए। museum को घूमना और देखना भी काफी रोचक रहा। जहाँ नीचे की मंजिल पर वस्त्र ,वाध यन्त्र ,ब्रौकेड्स,gyetongpa सुनहरी पांडुलिपि ,बर्तन और अनेकों चीजों के साथ-साथ १००० साल पुराना हाथी दांत (tusk) भी देखा। :)


और
ऊपर की मंजिल पर बड़े-बड़े बर्तन जिनमे कभी खाना बना करता था और चाय बनाने का एक ख़ास तरह का बर्तन वगैरा भी देखे। जिसे आज भी तवांग मे चाय बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है ।
स्कूल और लाइब्ररी नहीं देख पाए क्यूंकि स्कूल बंद हो चुका था। और हाँ इस monestary मे कैमरे के अलग-अलग चार्ज लगते है जैसे still camera का २० रुपया ,video camera के १०० रूपये और movie camera का ५०० रूपये लगता है।

खैर
अगली बार जब जायेंगे तब देखेंगे।आज की यात्रा अब यही ख़त्म कर रहे है। आप लोग भी थक गए होंगे। :)

Thursday, April 29, 2010

तवांग यात्रा --१ !(tawang)


तवांग अरुणाचल प्रदेश का एक डिस्ट्रिक्ट है और एक खूबसूरत पर्यटन स्थल भी है । तवांग जाने के लिए आसाम से होकर जाते है फिर चाहे सड़क के रास्ते जाए या फिर हेलीकाप्टर से जाए। भूटान और चीन तवांग के सीमावर्ती देश है।वैसे नवम्बर-दिसंबर मे चीनी सैनिकों की इसके बोर्डर के पास पहुँचने की खबर तो आप लोगों ने भी देखी ही होगी। जब हेलीकाप्टर से जाते है तो भूटान को cross करते है।खैर जब हम लोगों ने तवांग जाने का कार्यक्रम बनाया तो ये सोचा गया कि एक तरफ से हेलीकाप्टर से जाया जाए और लौटने मे सड़क के रास्ते आया जाए जिससे दोनों तरफ का मजा लिया जा सके। तो जनवरी मे जब यहां मौसम काफी अच्छा था तो हम लोगों ने तवांग के लिए पवनहंस हेलीकाप्टर का टिकट लिया (३ हजार)प्रति व्यक्ति । वैसे चाहे गौहाटी से जाए तब भी इतना ही किराया लगता है।
ईटानगर से गौहाटी का रास्ता १ घंटे १० मिनट मे पूरा किया । और वहां से गौहाटी के यात्री उतर गए और आधे घंटे तक हेलिकॉप्टर गौहाटी मे रुका रहा और फिर वहां से ३-४ और लोग तवांग जाने के लिए चढ़े। २४ सीट वाले हेलिकॉप्टर मे सिर्फ ८ यात्री और ५ crew member तवांग के लिए चले।गौहाटी से तवांग की दूरी १ घंटे मे पूरी करते है। जिसमे पहले २० मिनट हेलिकॉप्टर आसाम और फिर अगले २० मिनट भूटान और उसके बाद अगले २० मिनट अरुणाचल प्रदेश के ऊपर से गुजरता है
क्यूंकि जब हेलिकॉप्टर गौहाटी से दोबारा अपनी उड़ान भरता है तो कॉकपिट का दरवाजा खुला ही रहता है। जिससे सामने का पूरा view दिखता रहता है। भूटान cross करने मे जो २० मिनट लगते है उस दौरान रोमांच और डर दोनों की मिली जुली सी फीलिंग आती है। सांस अटकी रहती है क्यूंकि उस बीच मे हेलीकाप्टर के कॉकपिट का दरवाजा खुला रहता है और सामने दो पहाड़ों के बीच से हेलीकाप्टर गुजरता हुआ दिखता रहता है और नीचे खाई दिखती रहती है। और हवा के दबाव की वजह से हेलीकाप्टर थोड़ा-थोड़ा हिलता -डुलता सा चलता है। और उनका एक crew member emergency button हाथ मे पकडे रहता है जिसे देख देख कर थोड़ा और डर लगता रहता है।

जब
हेलीकाप्टर भूटान से गुजरता है तो दाहिनी ओर सबसे पुरानी मोनेसट्री भी दिखाई पड़ती है। पर चूँकि हम बायीं ओर बैठे थे इसलिए सोचा था कि भूटान मे प्रवेश करते ही दाहिनी ओर चले जायेंगे पर बाद मे हिम्मत नहीं हुई।पर हाँ अगली बार तवांग जाने पर उस मोनेसट्री की फोटो जरुर खींचेंगे।
तवांग तकरीबन ८ हजार फीट की ऊंचाई पर है और यहां ज्यादातर सर्दी का मौसम रहता है, और अक्सर बर्फ भी गिरती रहती है।जून,जुलाई और अगस्त मे यहाँ खूब बारिश होती है और सितम्बर से नवम्बर का समय सबसे अच्छा होता है यानी की सुहावना मौसम होता है और यहां अक्टूबर मे tourisim festival होता है। और नवम्बर से मार्च तक का समय जाड़े का होता है। तवांग की मुख्य नदी का नाम तवांग चू (tawang chu) है ।और यहां की मुख्य tribe मोनपा (monpa)है। और यहां की औरतें जो तिब्बती स्टाइल का गाऊन पहनती है उसे चुपा (chupa) और आदमी जो तिब्बती स्टाइल की शर्ट पहनते है उसे तोह-थुंग (toh-thung)कहते है। और ये लोग पारंपरिक स्टाइल का जो coat पहनते है उसे खंजर (khanjar)कहते है। और यहां के लोग एक ख़ास तरह की कैप पहनते है जिसे गामा शोम ( ngama-shom ) कहते है और ये याक (yak) के बालों से बनी होती है।

यूँ तो यहां पर कई त्यौहार मनाये जाते है जिनमे लोसर (losar)जिसके बारे मे हमने पहले mamtatv पर लिखा था वो मुख्य त्यौहार है जिसे नए साल के रूप मे बनाया जाता है। और तोरग्या (torgya) जिसे बुराइयों को और किसी भी तरह की प्राकृतिक आपदा को दूर रखने के लिए मनाया जाता है। ये त्यौहार जनवरी मे मनाया जाता है।और यहां का lion dance भी काफी मशहूर और देखने लायक होता है।

नोट--जैसे हिंदी फिल्मों मे दिखाते है कि हेलीकाप्टर मे लोग बड़े आराम से बात करते है या गाना गाते है पर असल मे ऐसा नहीं होता है। हेलीकाप्टर मे इतनी आवाज होती है कि कुछ ठीक से सुनाई भी नहीं देता है और बिना headphone के बैठा ही नहीं जाता है। :)

ये सारी फोटो हेलीकाप्टर से ली है सिर्फ पहली और आखिरी दो फोटो को छोड़ कर


Thursday, April 22, 2010

थेरावदा बौद्ध धर्म का शंकेन फेस्टिवल

बीते १४ अप्रैल को एक साथ तीन-चार त्यौहार पड़े थे जिनमे आसाम का बिहू , तमिल नाडू का पोंगल ,पंजाब का बैसाखी का त्यौहार,केरल मे विशु तथा बौद्ध धर्म का शंकेन फेस्टिवल पड़े थे।
आज हम शंकेन के बारे मे लिखने जा रहे है ।हो सकता है शंकेन के बारे मे आपने सुना हो पर हमने बौद्ध धर्म के इस त्यौहार के बारे मे यही आकर जाना तो सोचा कि आप लोगों को भी इसके बारे मे बताया जाए।
ये त्यौहार थेरावदा बौद्ध धर्मं के अनुयायी नए साल के रूप मे मनाते है ।इसे एकता,समृद्धि के साथ-साथ नौज-मस्ती का त्यौहार भी माना जाता है। शंकेन शब्द संस्कृत के संक्रांति से लिया गया है । थेरावदा बौद्ध धर्मी मानते है की सूरज अपनी घूमने की प्रक्रिया मेष राशि से शुरू करके आखिरी राशि मीन मे आने के बाद जब पुन मेष मे प्रवेश करता है तो इसे बौद्ध धर्मी नए सूरज का आगमन मानते है और इसे नया साल कहते है।ये फेस्टिवल एशिया के म्यनमार ,थाईलैंड,कम्बोडिया,श्री लंका,बंगलादेश के साथ-साथ उत्तर-पूर्वी भारत मे भी मनाया जाता है।१४ अप्रैल को ९ बज कर २८ मिनट पर एशिया के ज्यादातर देशों मे एक साथ ही इसकी पूजा शुरू हुई थी। और ये त्यौहार तीन दिन तक चलता है।पहले दिन भगवान की मूर्ति बाहर निकालते है और तीसरे दिन भगवान बुद्ध की प्रतिमा को वापिस मुख्य मंदिर मे रखा जाता है । इसमें भगवान बुद्ध की मूर्ति को मुख्य मंदिर से बाहर निकाल कर बाहर प्रांगण मे बने छोटे से मंदिर मे रखते है। और इस मंदिर के बीचों- बीच बम्बू से बनी एक व्हिर्ल मशीन सी बनी होती है जिसे कोंग्पन (kongpan )कहते है और जिसमे बहुत सारे छेद होते है और इसका एक सिरा पानी के पाईप से जुड़ा होता है । और ये बहुत ही रंगीन और सुन्दर होती है।इस मंदिर मे भगवान बुद्ध की मूर्ति को इस कोंग्पन के चारों ओर गोलाकार ढंग से इस तरह से रखते है । जिससे जब कोंग्पन से जुड़े सिरे पर पानी डाला जाता है और पानी के कारण जब कोंग्पन घूमता है तो इसमें बने हुए छिद्रों से पानी भगवान बुद्ध की प्रतिमा पर पड़ता है। और ये प्रक्रिया बिना रुके पूरे दिन दिन तक चलती है

इस दिन भगवान बुद्ध की प्रतिमा को स्नान तो कराया जाता है पर इसमें एक बात ख़ास ये है की इसमें सिर्फ एक बार नहीं बल्कि कम से कम ७ बार पानी डाला जाता है। और ना केवल बुद्ध की प्रतिमा पर बल्कि मोनेस्ट्री मे हर स्थान को पानी से धोने की प्रक्रिया की जाती है।प्रतिमा को स्नान करवाने के बाद वहां मोमबत्ती और अगरबत्ती जलाते है और पूजा करते है। और इस सबके बाद मोनेस्ट्री के मुख्य मंदिर मे जाकर भी पूजा करते है ।

इस त्यौहार को water festival भी कहा जाता है क्यूंकि इस दिन सभी लोग एक -दूसरे पर पानी डालते है (होली स्टाइल मे )।लोग अपने कपडे भी लेकर आते है ताकि पानी मे भीगने के बाद कपडे बदल सके। पूरी मोनेस्ट्री मे हर तरफ पानी से भीगे लोग दिखाई देते है या फिर लोग एक-दूसरे पर पानी डालते हुए नजर आते है। हम लोग भी जब सुबह इस मोनेस्ट्री मे पहुंचे तो गेट पर ही एक सज्जन ने हम लोगों को रोका और सावधान किया कि अगर आप अन्दर आयेंगे तो बिना भीगे वापिस नहीं जा पायेंगे । तो हमने कहा कि बाद मे ना पहले हम फोटो तो खींच ले। तो वो बोले कि हाँ ।
फिर हम लोग जैसे ही मोनेस्ट्री के अन्दर चले कि चारों ओर बड़े-बच्चे ,लड़के-लड़कियां सभी लोग छोटी-छोटी पानी की बाल्टी लेकर पहले भगवान बुद्ध को स्नान करवाते हुए दिखे ।और फिर मोनेस्ट्री मे बने स्तूप और हर तरफ पानी डालते हुए दिखे। और जब हम बड़े मजे से विडियो बना रहे थे तो एक महिला (नीचे फोटो मे उनकी पीठ दिख रही है। )ने पीछे से हम पर भी पानी डाल दिया था। :)

कहीं आप ये तो नहीं सोच रहे कि एक दिन मे हम कितने फेस्टिवल देखते है :) अरे ऐसा कुछ नहीं है ,दरअसल festival के बारे हमें पहले से पता नहीं था उसी दिन सुबह अखबार मे पढ़ा तो बस इसे देखने पहुँच गए :)
अरे अगर देखेंगे नहीं तो फिर लिखेंगे कैसे :)



Saturday, April 17, 2010

रोंगाली बिहू फेस्टिवल (rongali bihu) लावण्या जी ये पोस्ट आपके लिए है


लावण्या जी आपने हमसे ईटानगर आने पर बिहू पर कुछ लिखने के लिए कहा था तो आज की ये पोस्ट आपके लिए ख़ास तौर पर।परसों यानी १४ अप्रैल को यहां ईटानगर मे बिहू बड़े ही जोश से मनाया गया ।बिहू जिसे आसाम मे नए साल के रूप मे मनाया जाता है।और इस दिन से बसंत (स्प्रिंग सीजन ) का आगमन भी मानते है. ,और साथ-साथ ये फेस्टिवल कृषि से भी जुडा है। यहां ईटानगर मे भी आसामी लोगों की काफी संख्या है और इसीलिए हमें भी ये फेस्टिवल देखने का मौका मिला:)

अब बिहू डांस तो हमने देखा था पर असल मे बिहू क्या है ये कल ही पता चला।और पहली बार ये भी पता चला कि आसाम मे ३ बिहू फेस्टिवल मनाये जाते है - रोंगौली बिहू (बोहाग बिहू), कोंगौली बिहू (काती बिहू) ,भोगौली बिहू (माघ बिहू) इस फेस्टिवल मे मौजूद लोगों से बात करने पर उन्होंने बताया कि बिहू यानी जिस दिन नया साल शुरू होता है उसी दिन खेतों मे पहली बार हल चलाया जाता है। किसान लोग अपनी नयी फसल बोने के लिए तैयारी करते है। और लड़के लड़कियां नाचते है गाते है खुशियाँ मनाते है। लोग नए कपडे पहनते है।

बिहू के दिन ख़ास पकवान बनाए जाते है जिसमे पीठा मुख्य होता है। पीठा पिसे चावल से बनाया जाता है
बिलकुल पैन केक की तरह। और इसमें तिल,नारियल वगैरा की फिलिंग करते है।तो चलिए अब कुछ आँखों देखा वर्णन भी हो जाए बिहू का क्यूँ ठीक है ना। :)
यहां के मोपिन ग्राउंड मे सुबह करीब ११ बजे बिहू उत्सव की शुरुआत मेसबसे पहले झंडा फहराया गया और एक बेहद मीठा और खूबसूरत गीत गाया गया। और उसके बाद कुछ नृत्य प्रतियोगिताएं हुई। और फिर ढाई बजे से मुख्य कार्यक्रम शुरू हुआ। जिसमे मुख्य अतिथि rural development मंत्री तकर मारदे (takar marde) तथा अन्य मेहमानों का पारंपरिक ढंग से यानी गोम्सा,(gomsa)जापी,(jaapi) से स्वागत किया गया। और सबको एक लैम्प भी दिया गया ।(इसे क्या कहते है नहीं जानते है )
और उसके बाद अलग-अलग ग्रुप समूहों ने मशहूर बिहू नृत्य पेश किये । जिनमे आसाम की सुन्दर झलक देखने को मिली।
और यहां पर दोनयी पोलो स्कूल के स्पेशल चिल्ड्रन के ग्रुप ने बहुत ही खूबसूरत बिहू नृत्य आसाम के पारंपरिक पहनावे यानि मेखला पहनकर पेश किया था । बाद मे इन बच्चों को इनके सुन्दर डांस परफोर्मेंस के लिए पुरस्कार दिया गया था।
हम लोग तो थोड़ा जल्दी वापिस आ गए थे पर ये कार्यक्रम काफी देर तक चलता रहा था।विडियो हमने youtube पर अपलोड किये हैचाहे तो देख सकते है क्यूंकि आजकल हमें ब्लॉगर मे विडियो अपलोड करने मे कुछ दिक्कत रही है

Friday, April 9, 2010

मोपिन फेस्टिवल (mopin festival of Aalo)

५ अप्रैल को ईटानगर मे mopin festival बड़े ही धूम-धाम से मनाया गया।ये festival अरुणाचल प्रदेश के Aalo डिस्ट्रिक्ट का मुख्य festival है।और इसे यहां की गालो (galo) tribe नए साल के रूप मे मनाती है। ये festival पूरे एक हफ्ते तक चलता है। पहली अप्रैल से ८ अप्रैल तक चलने वाले इस festival मे शुरू के २ दिनों मे विभिन्न सांस्कृतिक प्रतियोगिताएं आयोजित होती है। और तीसरे दिन priest का स्वागत किया जाता है, चौथे दिन ईटानगर मे बने मोपिन ग्राउंड मे इनके priest आते है और इसी दिन मोपिन ग्राउंड मे rice beer तथा अन्य खाने-पीने की चीजें तैयार की जाती है।पांचवे दिन मुख्य समारोह होता है और इसी दिन mopin देवी की स्थापना की जाती है। और galo tribe के लोग अपने यहां लंच और डिनर आयोजित करते है जिसमे सभी लोग आमंत्रित होते है ।

छठे दिन दिन फिर से सभी लोग सुबह mopin ग्राउंड मे इकठ्ठा होते है और आयोजित जगह पर लंच और डिनर करने जाते है। और यहां भी खूब डांस वगैरा होता है। और एक अच्छी बात ये होती है कि आम जनता के आने-जाने के लिए बस वगैरा की सुविधा भी लोगों को उपलब्ध कराई जाती है। जिससे उन्हें आने-जाने मे परेशानी ना हो। सातवें दिन मोपिन नाईट मनाई जाती है जिसमे खूब नाच-गाना होता है। आठवें दिन इस festival का समापन होता है
इस festival के माध्यम से लोगों को ये सन्देश जाता है कि agricultural season शुरू हो गया है मोपिन देवी के आशीर्वाद से और व्यक्ति की कड़ी मेहनत से समृद्धि,अच्छी सेहत और धरती पर रहने वाले सभी वन्य जीव-जन्तुओं को संरक्षित किया जा सकता है। (It is the ritual for fertility of crops,plants,animals,and human beings.)
मोपिन (agriculture) कृषि की देवी का नाम है। mopin anv (मदर) ने सबसे पहले अबू तानी (तानी ग्रुप का पहला व्यक्ति जो सबसे पहले धरती पर आया था। ) को बोने की कला (art of cultivation)सिखाई थी। ना केवल खेती की कला सिखाई बल्कि mopin और उनकी २ बेटियों piqku pintv और dwyww taamww ने खेती और बोने के काम आने वाली वस्तुएं और बीज अबू तानी को दिखाए और उनका प्रयोग करना भी सिखाया । और mopin anv तुलना अन्नपूर्णा देवी और लक्ष्मी से की जा सकती है ।
इस दिन सभी बड़े और बच्चे सफ़ेद रंग के कपडे पहनते है क्यूंकि सफ़ेद शुद्धता और शान्ति का प्रतीक है। महिलायें हरे मोतियों की लम्बी सी माला पहनती है तथा कमर मे करधनी सी पहनती है। और सभी पुरुष सफ़ेद रंग की जैकट और नीले रंग के मोतियों की माला पहनते है। और कुछ लोग सफ़ेद टोपी पहनते है तो कुछ लोग बम्बू की बनी टोपी भी पहनते है। (हम को भी सफ़ेद रैप अराउंड दिया गया जिसे हमने डिनर मे पहना था ) :)

५ अप्रैल को हम भी ईटानगर मे बने mopin ग्राउंड मे mopin festival को देखने गए थे।हालाँकि इस दिन खूब बारिश हो रही थी और एक बार तो हम लोग यहां जाने का प्रोग्राम कैंसिल भी कर रहे थे पर फिर जब थोड़ी बारिश रुकी तो हम लोगों ने सोचा की चल कर देख ही लिया जाए। और जब मोपिन ग्राउंड मे हुंचे तो वहां मौजूद लोगों का जोश देखकर लगा की अच्छा हुआ जो हम लोग आ गए वर्ना इस साल इस festival को देखने का मौका चूक जाते।

गेट पर जैसे ही पहुंचे तो सबसे पहले लड़के-लड़कियां जो स्वागत के लिए खड़े होते है उन्होंने चावल और अदरक से बने पेस्ट को गाल पर लगाया और हैप्पी मोपिन कहा । इस फोटो मे stage पर जो ये झालर सी देखाई दे रही है वो बम्बू से ही बनी है। इस festival के मुख्य अतिथि अरुणाचल प्रदेश के वित्त मंत्री setong sena (सफ़ेद जैकट पहनते हुए)थे और विशेष अतिथि यहां के लोकल एम.एल.ए. techi kaso(भूरी जैकट मे ) थे।और यहां के मुख्य सचिव tabom bam इसके चीफ पेट्रन थे। festival के दौरान rice beer और कोल्ड ड्रिं और भिन्न -भिन्न प्रकार के स्नेक्स सर्व किये गए ।
मुख्य फेस्टिवल के दिन सुबह ७ बजे से ही लोग मोपिन ग्राउंड मे इकठ्ठा होने लगते है और फिर दोपहर तक कार्यक्रम चलता है। जिसमे सबसे पहले rice beer सर्व की जाती है और इनका पारंपरिक डांस पोपिर (popir) शुरू होता है। उसके बाद मोपिन देवी को स्थापित किया जाता है।हालाँकि हम ये देख नहीं पाए थे क्यूंकि हम जरा देर से पहुंचे थे । :(
festival शुरू करने के पहले mopin anthem भी गाया गया। समारोह के दौरान ही बीच-बीच मे मुख्य अतिथि और विशेष अतिथि ने भाषण भी दिया और साथ- साथ popir डांस भी प्रस्तुत किया गया। । इस अवसर पर खिलाड़ियों को पुरस्कार भी दिए जाते है।और आखिर मे सभी मेहमान मिलकर डांस करते है। और डांस के दौरान piqku pintv और dwyww taamww का उदघोष करते रहते है।
mopin festival के दौरान मिथुन की बलि चढ़ाई जाती है। और बलि चढाने के पहले लोग मिथुन की पूजा करते है , और बलि के बाद मिथुन के बाल और रक्त को लोग अपने-अपने घर ले जाते है क्यूंकि इसे बहुत auspicious माना जाता है
मिथुन की बलि के बाद एक बार फिर सभी लोग चावल का पेस्ट सभी को बिलकुल उसी तरह लगाते है जिस तरह होली मे हम लोग गुलाल लगाते है।

और समारोह के खत्म होने के बाद हम लोग भी आयोजित जगह पर लंच खाने गए । और वहां पर एक बार फिर से चावल का पेस्ट लगाकर स्वागत किया गया । वहां पर भी खूब डांस और गाने का कार्यक्रम हुआ। साथ ही बहुत बढ़िया लंच भी हुआ। शाम को हम लोग भी बिलकुल पारंपरिक पहनावे मे मतलब सफ़ेद ड्रेस मे गए और मोपिन festival का भरपूर आनंद लिया। और फिर अप्रैल को मुख्य सचिव के घर पर आयोजित डिनर पर भी गए जहाँ डिनर के पहले गीत-संगीत का सुन्दर आयोजन था और स्वादिष्ट डिनर का भी आयोजन था। । और यहां पर मुख्य सचिव की पत्नी tobi bam ने बहुत ही खूबसूरत एक गीत प्रस्तुत किया था।

और फिर को मोपिन नाईट का मजा लिया :)