Monday, August 23, 2010

फ्रोजन लेक्स ऑफ़ तवांग frozen lakes of tawang (तवांग ४)

तवांग की यात्रा के दौरान वहां की फ्रोजन लेक्स के बारे मे पता चला जिसे सुनकर थोडा आश्चर्य भी हुआ की तवांग जैसी जगह मे लेक्स भी है । वहां पर छोटी-बड़ी बहुत सारी तकरीबन १०० से भी ज्यादा लेक्स है पर उनमे से कुछ बहुत मशहूर है जैसे PT Tso (panggang- teng- Tso ) जो की १४ की.मी. की दूरी पर है और वहां से तकरीबन २०-२५ की.मी. आगे जानेपर jong-nga-tseir या shungetser lakeजिसे अब माधुरी लेक भी कहा जाता है ,पड़ती है ।और पूरे ४० -४५ की.मी. के रास्ते मे ढेरों लेक्स पड़ती है जिन्हें देखकर मन खुश होता रहता है। हालाँकि रास्ता बहुत खराब है और बहुत ही दुर्गम से पहाड़ है पर थोड़ी-थोड़ी बर्फ पहाड़ों पर जमी हुई, याक , लेक्स और रास्ते भर आर्मी की गाड़ियों को देखते हुए वो खराब रास्ता भी पार हो जाता है ।पूरे रास्ते बस आर्मी के कैंप और बंकर नजर आते है।

तो अगले दिन सुबह सुबह वहां जाने का कार्यक्रम बनाया गया और साथ मे खाना-पानी वगैरा भी पैक करा गया क्यूंकि इन लेक्स पर कहीं भी कुछ भी खाने के लिए नहीं मिलता है। और रास्ते मे कुछ मिलने का सवाल ही नहीं है। खैर सुबह २ गाड़ियों (टाटा सुमु ) मे हम लोग चले ।

तो सबसे आर्मी की एक चेक पोस्ट पड़ी और वहां पर एंट्री करके आगे चले तो ५ की.मी.जाने पर आर्मी की एक और चेक पोस्ट हर मैदान फ़तेह मराठा ग्राउंड पड़ी जहाँ एक बार फिर से एंट्री करनी पड़ी और फिर वहां से आगे बढ़ने पर पेड़ों और पहाड़ों पर जमी बर्फ और इधर-उधर घूमते हुए याक नजर आये ।वैसे वहां के लोगों ने बताया की इस पूरे रास्ते बहुत सुन्दर orchids दिखते है जिनकी वजह से रास्ता बहुत खूबसूरत लगता है पर चूँकि उस समय सीजन नहीं था इसलिए हम orchids नहीं देख पाए।
६ की.मी. और आगे जाने पर PT Tso lake पड़ी और जब हम लोग कार से उतरे तो बूडूम - बूडूम की आवाज आई ।और जब लेक के पास पहुंचे तो बर्फ चटकने की आवाजें बिलकुल साफ़ सुनाई देनी लगी। और इस बूडूम-बूडूम मे एक अजीब सी गूँज सी हो रही थी। जिसे सुनकर बहुत रोमांच सा हो रहा था। लेक के इस तरफ बौद्ध धर्म के झंडे जिन्हें माना जाता है की ये हवा को और आस-पास के माहौल को शुद्ध करते है वो लगे हुए थे और लेक के दूसरी तरफ पहाड़ थे जिनमे कुछ हरे रंग के और कुछ लाल रंग के पेड़ और उन पर थोड़ी-थोड़ी बर्फ बड़ी अलग से लग रही थी ।


PT Tso पर कुछ फोटो वगैरा खींच कर हम लोग आगे चल पड़े तो थोड़ी दूर पर एक और आर्मी की चेक पोस्ट पड़ी।और यहां से एक रास्ता कट कर बूमला जाता है जो आगे चीन के बार्डर तक जाता है। खैर हम लोग बूमला ना जाकर आगे बढे और ऊँचे-नीचे उबड़-खाबड़ रास्ते से होते हुए shungetser lake यानी माधुरी लेक की तरफ बढ़ते रहे ।रास्ते भर lakes तो बहुत दिखी पर उनमे से कुछ lakes आधी फ्रोजन यानी जमी हुई थी तो आधी मे पानी दिख रहा था।जैसे-जैसे माधुरी लेक के पास पहुँचने लगे तो सड़क के दोनों ओर और सड़क पर भी बर्फ दिखाई पड़ी। और इस माधुरी लेक के लिए कहा जाता है ये लेक १९७३ मे आई बाढ़ का परिणाम है। और हाँ इसे माधुरी लेक क्यूँ कहा जाता है ये तो बताया ही नहीं । वो क्या है ना की फ़िल्म कोयला की शूटिंग के लिए माधुरी और शाह रूख खान यहां आये थे । और बस उसके बाद से इस लेक को माधुरी लेक कहा जाने लगा।( ये माधुरी लेक की ऊपर से खींची हुई फोटो है )इस लेक पर पहुंचकर गाडी से उतरने पर पहले तो कुछ सेना के जवान दिखाई दिए और फिर हम लोग एक छोटे से लकड़ी के पुल से चलकर कच्चे-पक्के रास्ते से होते हुए इस फ्रोजन माधुरी लेक तक पहुँच गए।लेक के चारों और काले पत्थरों के पहाड़ दिखाई दे रहे थे और लेक के बीच-बीच मे सूखे हुए पेड़ के तने दिखाई दे रहे थे। और लेक पर पैर रखते ही एक अदभुद सा रोमांच हुआ पर हम लोग बहुत आगे तक नहीं गए पर हम लोगों के साथ गए हुए कुछ लोग चल कर लेक के बिलकुल बीच मे पहुँच गए थे और हमें भी कह रहे थे की मैडम डरिये मत ,आप लोग भी आ जाइए,पर हमारी हिम्मत नहीं हो रही थी (अरे भाई टी.वी.मे देखा है की किस तरफ अचानक ही बर्फ टूट जाती है ) पर जैसे ही बर्फ मे से ब्डूम की आवाज आई वो सभी चिल्लाते हुए दौड़ते हुए वापिस हम लोगों की तरफ भागे।फिर वहां बर्फ पर थोड़ी देर रूक कर हम लोग वापिस लौट कर बाहर आ गए और अपने साथ लाये हुए ब्रेड पकोड़ा ,सैंडविच ,पकोड़े, चाय,पेप्सी वगैरा खाया -पिया और एक बार फिर गाडी मे वापसी की यात्रा शुरू की।वैसे यहां पर एक रेस्तौरेंट बना हुआ है पर चलता कम है क्यूंकि वहां ज्यादा लोग जाते नहीं है। (उस दिन तो बंद ही था ) :(और जब हम लोग खा-पी रहे थे तो वहां ३-४ doggi आ गए थे ।और बहुत शांति से बैठ गए तो हम लोगों ने उनको भी खाना खिलाया। वहां से हम लोग २ बजे तक निकल लिए क्यूंकि वहां पर अँधेरा बहुत जल्दी हो जाता है और रास्ते मे लाईट होती नहीं है और रास्ते भी कुछ ज्यादा अच्छे नहीं है। और रास्ते मे कब क्या मुसीबत आ जाए कहा नहीं जा सकता।
वो ऐसा हम इसलिए कह रहे है क्यूंकि जैसे हम ही लोग वापिस लौटने लगे तो ४-५ की.मी.बाद ही बीच सड़क मे एक आर्मी का ट्रक कुछ इस तरह से खराब हुआ था और सड़क पर खड़ा था की ना तो कोई गाडी आ सकती थी और ना ही जा सकती थी। और वो लोग आराम से गाडी बनाने मे लगे थे। १५-२० मिनट तक हम लोग खड़े रहे फिर हम लोगों ने ड्राईवर को कहा कि जाकर बोलो कि ट्रक को एक तरफ साईड मे कर ले । पर ट्रक को हिलाना भी आसान नहीं था क्यूंकि चढ़ाई पर ट्रक खराब हुआ था।और ड्राईवर के कहने पर पहले आर्मी वालों को समझ भी नहीं आया । उन्हें लगा कि क्या बेवकूफी की बात कर रहे है। पर खैर आधे घंटे बाद उनकी मदद के लिए एक और ट्रक आया और फिर उन लोगों ने ट्रक को थोडा धक्का देकर एक साइड मे किया और फिर हम लोग वहां से निकल पाए।इस lake से ५ की.मी. आगे टी. गुम्पा (Tak-Tsang Monastery) पड़ती है । उसका जिक्र अगली पोस्ट मे।

Thursday, August 19, 2010

कॉमन वेल्थ गेम्स क्वींस बैटन रिले ( C W G queen's baton relay in itanagar)

अब चाहे जितने भी scam हो कॉमन वेल्थ गेम्स को लेकर पर जिस भी राज्य मे क्वींस बैटन आती है वो पूरा राज्य जोश मे भर जाता है। अब जैसे जुलाई मे जब क्वींस बैटन यहां आई तो ऐसा ही कुछ अरुणाचल मे भी हुआ था।

जैसा
कि हम सभी को पता है कि इस साल ३ अक्तूबर से दिल्ली मे कॉमन वेल्थ गेम्स होने वाले है
और
इसके लिए लन्दन से क्वीन एलिजाबेथ 2 ने खिलाड़ियों के लिए सन्देश इस बैटन मे भेजा है और इस सन्देश को ३ अक्तूबर को दिल्ली मे खेलों के उदघाटन समारोह मे पढ़ा जाएगा। क्वीन के सन्देश के साथ इस बैटन ने २९ अक्टूबर २००९ मे बकिंघम पैलस से अपना सफ़र शुरू किया । ये बैटन ७० देशों और पूरे भारत वर्ष मे घूमने के बाद ३ अक्टूबर को दिल्ली पहुंचेगी ।

इस बैटन के साथ तकरीबन १०-१५ लोगों की टीम चलती है । इस टीम को जनरल कदीयान लीड कर रहे थे । इस बैटन की खासियत ये है कि जब इसमें लाईट जलती है तो भारत के झंडे का तिरंगा रंग इस बैटन पर नजर आता है।जो बहुत ही खूबसूरत लगता है। दिन मे और रात मे बैटन बिलकुल अलग लगती है।

और २२ जुलाई को कॉमन वेल्थ गेम्स की क्वींस बैटन अरुणाचल प्रदेश के ईटानगर मे आई थी। अरुणाचल प्रदेश दसवां राज्य है जहाँ ये बैटन अपना सफ़र करते हुए पहुंची थी। अरुणाचल प्रदेश के दो डिस्ट्रिक्ट तवांग और ईटानगर मे इस बैटन को जाना था ,पहले इसे तवांग और फिर ईटानगर आना था और इसके लिए गौहाटी से इस बैटन को लेकर हेलीकाप्टर से तवांग के लिए लोग रवाना हुए पर भूटान के आगे मौसम खराब होने के कारण हेलिकॉप्टर वापिस गौहाटी लौट आया और फिर गौहाटी से हेलिकॉप्टर से ये बैटन ईटानगर आ गयी।नाहारलागन हेलीपैड पर हेलीकाप्टर के पायलेट और पादी रिको इस बैटन के साथ।
अब जब हम ईटानगर वापिस लौट आये है तो हम भी इस क्वींस बैटन रिले को देखने पहुँच गए। सबसे पहले नाहर लागन हेलीपैड पर सवा दो बजे इस बैटन को पादी रिको जो की पार्लियामेंट्री सेक्रेटरी है उन्होंने इसे रिसीव किया और बैटन का रिले शुरू हुआ जिसमे convoy और relay दोनों था। बैटन के साथ शेरा जो की कॉमन वेल्थ गेम्स का मेस्कोट है वो भी आया था। जैसा की आप इन कुछ फोटो मे देख सकते है।राजीव गाँधी स्टेडीयम मे बच्चों के बीच मे शेरा और नीचे वाली फोटो बैंक्वेट हाल की है जहाँ शेरा जब stage पर आ गए थे तो वापिस उतरने का नाम ही नहीं ले रहे थे।पूरे stage पर घूम रहे थे। :)और भाई जब हम relay देखने गए तो फिर शेरा से हाथ कैसे ना मिलाते। :) चूँकि इस बैटन मे relay और convoy दोनों था इसलिए कुछ दूर खिलाडी दौड़ते थे तो कुछ दूर convoy इस बैटन को लेकर चलता था।ये relay करीब ४ घंटे की थी।जिसमे नाहर लागन से होकर राजीव गाँधी स्टेडीयम,सांगो होटल,जेनरल हॉस्पिटल, लागुन ब्रिज,डी.सी. ऑफिस,राज भवन ,इटा फोर्ट,टी.जी.गुम्पा,लेजी काम्प्लेक्स,पंजाबी ढाबा,आई.जी.पार्क,बी.बी.प्लाज़ा,आकाशदीप मार्केट,निर्वाचन भवन,से होते हुए बैनक्वेट हॉल मे आनी थी।यानी की पूरे ईटानगर मे इस बैटन को घुमाया गया।
हेलीपैड से सबसे पहले एक काफिले के साथ इस बैटन को राजीव गाँधी स्टेडीयम ले जाया गया जहाँ इस बैटन को रक्खा गया और फिर मुख्य अतिथि के छोटे से भाषण के बाद इस बैटन को gumpe rime जो की फूटबाल खिलाडी है ये बैटन उन्हें सौंपी गयी और gumpe rime ने पूरे स्टेडीयम का चक्कर लगाया
और वहां से ये बैटन अनेकों खिलाड़ियों और officials के हाथोंमे होती हुई शाम साढ़े ६ बजे आई .जी. पार्क पहुंची और वहां से बैनक्वेट हॉल तक अलग-अलग खेलों जैसे फूटबाल,बैडमिनटन,और वेट लिफ्टिंग के खिलाड़ियों ने इस बैटन को लेकर रिले किया यानी इसे लेकर दौड़े।जब ये बैटन बैनक्वेट हॉल के गेट पर पहुंची तो वहां से अरुणाचल प्रदेश के स्पोर्ट्स सेक्रेटरी इस बैटन को लेकर दौड़े और पोर्टिको मे ये बैटन अरुणाचल प्रदेश के मुख्य सचिव को सौंपी गयी और वहां से मुख्य सचिव इस बैटन को लेकर बैनक्वेट हाल के अन्दर गए और इस बैटन को पेडस्टल या इसके स्टैंड पर रख दिया गया। और फिर फोटो खींचने और खिंचवाने का सिलसिला शुरू हुआ । और उसके बाद अरुणाचल प्रदेश की विभिन्न tribes ने शानदार सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किया।
अगले दिन २३ जुलाई को ये बैटन अरुणाचल प्रदेश से निकल कर अपने आगे के सफ़र पर चल पड़ी यानी कि दूसरे राज्य ।

Monday, August 16, 2010

ईटानगर मे स्वतंत्रता दिवस समारोह

कल १५ अगस्त को सारे भारत वर्ष की तरह ईटानगर मे भी स्वतंत्रता दिवस काफी जोश से मनाया गया। हालाँकि यहां एक दिन पहले बारिश हुई थी जिसकी वजह से १५ अगस्त को मौसम काफी सुहावना था । हाँ थोड़ी-थोड़ी बूंदा-बादी हो रही थी पर उससे लोगों के जोश और उत्साह मे कोई कमी नहीं थी।क्यूंकि लोग छाता लगाकर परेड देख रहे थे ।सुबह -सुबह ६ जब हम लोग उठे तो देखा सर्किट हाउस मे (हम अभी यही रह रहे है) बड़ी चहल-पहल दिखी और छोटे-छोटे बच्चे तैयार होकर इकठ्ठा हो रहे थे पूछने पर पता चला कि सभी बच्चे झंडा फहराने के लिए इकठ्ठा हो रहे है। तो सर्किट हाउस वालों से पूछने पर पता चला कि सात बजे झंडा फहराया जायेगा। बस फिर हम अपना कैमरा लेकर तैयार हो गए फोटो खींचने के लिए। और ठीक ७ बजे सर्किट हाउस के जे.इ.ने झंडा फहराया और सभी ने राष्ट्रीय गान भी गाया और उसके बाद जे.इ.ने एक छोटा सा भाषण भी दिया और फिर बच्चों को लड्डू और रसगुल्ले बांटे गए ।इसके बाद साढ़े आठ बजे हम लोग तैयार होकर इंदिरा गाँधी पार्क गए जहाँ स्वतंत्रता दिवस समारोह के लिए लोग जमा हो रहे थे । ठीक ९ बजे यहां के मुख्य मंत्री दोरजी खंडू समारोह स्थल पर आये और उन्होंने तिरंगा झंडा फहराया।फिर उन्होंने परेड का निरीक्षण कीया।परेड के निरीक्षण के समय डी.आई.जी.देओल भी उनके साथ थी। और उसके बाद उन्होंने एक लम्बा सा भाषण दिया जिसमे उनकी सरकार क्या-क्या कर रही है उसके बारे मे बताया ।उसके बाद यहां के मुख्य सचिव तबम बाम ने उन लोगों के नाम पढ़े जिन्हें इस साल गोल्ड और सिल्वर मेडल दिए जाने थे।इसके बाद सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किया गया ।
उसके बाद विभिन्न रेजिमेंट्स ने और स्कूल के बच्चों ने परेड की ।
जिसमे सबसे पहले यहां की tribes ने कुछ नृत्य प्रस्तुत किये और उसके बाद स्कूल के बच्चों ने कुछ बहुत ही खूबसूरत नृत्य प्रस्तुत किये जिसमे माँ तुझे सलाम ,मिले सुर मेरा तुम्हारा ,ऐ मेरे वतन के लोगों और जोधा अकबर के गीत थे ।इस फोटो मे नीले कपडे वाले सैनिकों के बीच मे जो बैठे है वो अकबर है। :)
तकरीबन डेढ़ घंटे तक ये समारोह चला और उसके बाद सबसे अच्छी परेड और सबसे अच्छे नृत्य को पुरस्कार दिया गया और इस फोटो मे मिले सुर मेरा तुम्हारा प्रस्तुत करने वाले बच्चे प्रथम पुरस्कार की अपनी ट्राफी के साथ जीत की ख़ुशी मनाते हुए दिखाई दे रहे है ,वैसे इनका विडियो हम you tube पर अपलोड करने वाले है । और बाकी सभी को पार्टीसीपेशन प्राइज दिया गया।


और इस तरह ६३वाँ स्वतंत्रता दिवस समारोह समपन्न हुआ ।

Friday, May 21, 2010

तवांग यात्रा (३) तवांग वार मेमोरिअल (tawang war memorial)

तवांग मे जैसे ही प्रवेश करते है तो हर तरफ भारतीय सेना के जवान ,सेना की कारें,ट्रक,वगैरा बहुत दिखाई देते है क्यूंकि तवांग चीन और भारत के बार्डर का डिस्ट्रिक्ट है। १९६२ मे जब चीन ने (sino-india war) भारत पर आक्रमण किया था और चीनी सैनिक भारत मे प्रवेश करने की कोशिश कर रहे थे उस समय तवांग मे तैनात भारतीय सैनिकों ने अपूर्व जौहर और हिम्मत से चीनी सैनिकों का सामना किया था और उन्हें भारत मे प्रवेश करने से रोका था।इस लड़ाई मे २४२० भारतीय सेना के जवान शहीद हो गए थे और इन्ही शहीदों की याद मे ये memorial बनाया गया है। ये memorial तवांग शहर से १ कि.मी.की दूरी पर है और यहां तक जाने मे रास्ते मे दोनों तरफ सेना के शिविर और सड़क के दोनों ओर बहुत सारे बोर्ड ,झंडे और मूर्तियाँ अलग-अलग रेजिमेंट के बहादुर सैनिकों की दिखाई देती है। और इस १ कि.मी.के रास्ते मे सेना के जवान आते-जाते हुए भी दिखाई देते है।
इस memorial का निर्माण १५ अगस्त १९९८ मे शुरू हुआ था और २ नवम्बर १९९९ को इसे उन २४२० शहीदों को समर्पित किया गया जिन्होंने चीनी सैनिकों से लड़ते हुए अपनी जान अपने देश पर कुर्बान कर दी थी। इस memorial की ख़ास बात ये है कि ये तवांग के तकरीबन पूरे शहर से दिखाई देता है।
जैसे ही इस war memorial के गेट से प्रवेश करते है तो दाहिनी ओर एक बोफोर्स तोप दिखाई पड़ती है और इसी के पास कार पार्किंग भी है। यहां से थोडा आगे बढ़ने पर भगवान बुद्ध की सफ़ेद मूर्ति बनी हुई है। यहां पर जैसे ही कार से उतरते है तो सामने सीढियां दिखाई देती है और इन सीढ़ियों के प्रवेश द्वार पर खड़े होकर देखने पर यहां बना ४० फीट ऊँचा स्तूप दिखाई देता है ।

इस
war memorial मे बुद्ध धर्म की झलक साफ़ दिखाई पड़ती है -प्रवेश द्वार और ऊपर भी । सीढ़ियों से ऊपर जाने पर धर्म चक्र (monestary जैसे )दिखाई पड़ते है । यहां स्तूप के चारों ओर दीवारों पर उस युद्ध मे शहीद हुए सभी जवानों के नाम उनकी रेजिमेंट के साथ लिखे हुए है ।
इस war memorial मे ऊपर की तरफ भारतीय झंडे के साथ साथ सभी रेजिमेंट के झंडे लगे हुए है । रोज सुबह सूर्योदय के साथ इन्हें फहराया जाता है । और हर रोज शाम ५ बजे जब सूरज ढलने लगता है यानी सूर्यास्त के समय इन सभी झंडों को बिगुल की धुन के साथ उतारा जाता है और इसे देखना भी अपने आप मे एक अनुभव है।इसका विडियो you tube पर लगाया हुआ है ।


इस स्मारक के चारों पत्थर लगे हुए है जिनपर शहीदों के लिए लिखा हुआ है कि किस तरह उन्होंने अपनी जान की परवाह ना करते हुए देश के प्रति अपना फर्ज निभाया था।
थोडा और आगे बढ़ने पर एक कमरे मे सूबेदार जोगिन्दर सिंह जी की प्रतिमा बनी है जिसके नीचे एक रीथ रक्खा हुआ है और साथ ही वहां पर राइफल्स और शहीद हुए जवानों की अस्थियाँ भी रक्खी हुई है। दीवार पर मेड़ेल्स लगे हुए है और इस लड़ाई के बारे मे लिखा हुआ है। जोगिन्दर सिंह जी की मूर्ति के नीचे किस बहादुरी और अदम्य साहस के साथ उन्होंने चीनी सेना से लड़ाई की लिखा हुआ है और जिसे पढ़कर सिर अपने आप उनकी शान मे झुक जाता है।यहां से आगे बढ़ने पर एक और कमरा पड़ता है जिसमे उस समय इस्तेमाल की गयी राइफल्स और गोलियां रक्खी है। और यहां पर दीवारों मे उस समय लड़ाई की फोटो लगी हुई है। साथ ही एक नक्शा भी लगा हुआ है। जिसके माध्यम से उस समय जैसे-जैसे लड़ाई आगे बढ़ी थी उसे दर्शाया गया है। जिसे पढ़कर और देख कर अपने देश के लिए जान कुबान करने वाले शहीदों पर नाज होता है ।

war memorial से बाहर आने पर बायीं ओर गिफ्ट शॉप पड़ती है जहाँ से हम लोगों ने इस war memorial के सोविनियर खरीदे। और वापिस गेस्ट हाउस आ गए।

Friday, May 14, 2010

तवांग यात्रा (२)(tawang)

चलिए अपनी तवांग यात्रा को आगे बढ़ाते है । तकरीबन साढ़े बारह बजे हम लोग तवांग पहुँच गए । जब हेलिकॉप्टर तवांग के हैलीपैड पर उतरा और हम लोग बाहर निकलने लगे तो कैप्टेन ने हम लोगों को हिदायत दी कि चूँकि आप लोग पहली बार तवांग आये है इसलिए एक दम से बहुत ज्यादा घूमने या ऊपर-नीचे पहाड़ों पर मत जाइएगा।क्यूंकि तवांग उंचाई पर है और यहां अक्सर ऑक्सीजन की कमी हो जाती है जिससे सांस की तकलीफ हो सकती है।तो इसलिए थोडा संभल कर रहिएगा। कैप्टेन को उनकी इस हिदायत के लिए धन्यवाद कह कर हम लोग गेस्ट हाउस की तरफ चल पड़े। हालंकि वहां सड़क ठीक -ठाक है और वहां के लोगों का कहना है कि चूँकि वहां बर्फ बहुत गिरती है इसलिए सड़क खराब होती रहती है।

खैर गेस्ट हाउस पहुंचकर चाय पी और फिर थोडा देर आराम करके घूमने का प्रोग्राम बनाया गया। और सबसे पहले वहां की ganden namgyal lhatse जिसे तवांग monestary भी कहते है उस को देखने का तय हुआ । इस monestary तक जाने के २ रास्ते है ।गाडी से जाने पर एक पूरे पहाड़ का चक्कर लगाकर वहां पहुँचते है । और दूसरा रास्ता सीढ़ी से जाने का है। खैर हम लोग कार से गए और बस ५-७ मिनट की ड्राइव के बाद हम लोग monestary मे थे।पर लौटने मे सीढ़ी से लौटे ।

इस
सारे रास्ते मे लामा भी दिखाई देते है। लामा लोद्रो ग्याम्त्सो ( lama lodroe gyamtso) ने १६८१ मे इस monestary की स्थापना की थी।1९९७ मे दोबारा इस monestary का निर्माण हुआ और इसे जनता को समर्पित किया गया।

NDTV ने इस monestary को spiritual wonder of india कहा है।ये monestary काफी बड़ी है और ये छठें लामा Tsangyang Gyatso की जन्मस्थली होने के कारण काफी महत्वपूर्ण मानी जाती है। ।इसमें लामा लोगों के लिए घर,स्कूल ,लाइब्ररी,है और एक museum भी है जो काफी अच्छा है। और जिससे पुराने इतिहास का पता चलता है।तवांग monestary ऊंचाई पर स्थित होने के कारण वहां से तवांग शहर का और तवांग शहर से इस monestary का नजारा काफी सुन्दर दिखाई देता है। (ये छोटे लामा अचानक कहीं से आ गए थे। )
monestary मे पहुँचते ही वहां व्याप्त शांति से मन प्रसन्न हो गया था। monestary काफी खाली-खाली लग रही थी क्यूंकि एक तो दोपहर का समय था और दूसरे यहां पर लामा लोगों के लिए जो स्कूल था वो बंद हो चुका था और सभी लामा अपने-अपने घरों मे थे। हाँ हम लोगों की गाडी रुकने पर कुछ लामा जिज्ञासा वश वहां जरुर आ गए थे।

खैर वहां के २ लामा हम लोगों को monestary दिखाने के लिए हम लोगों के साथ चले।( ये लामा हिंदी के साथ- साथ इंग्लिश भी बहुत अच्छी बोल रहे थे।)कुछ १०-१२ सीढियां उतर जब मुख्य प्रांगन मे पहुंचे तो चारों ओर नजर दौडाने पर monestary के सभी भवन और इमारतें सफ़ेद ,नीले,लाल और भूरे रंग मे थी और सभी मे सुन्दर और कलर फुल चित्रकारी दिखाई दी ।और बायीं ओर पुराना प्रार्थना भवन दिखाई देता है जो अब खाली रहता है और दाहिनी ओर दिए जलाने का भवन दिखाई देता है। (house of offering butter lamp)


मुख्य
ईमारत तीन मंजिला है जिसमे सबसे नीचे की मंजिल पर मुख्य प्रार्थना भवन जिसे दुखांग (Dukhang) कहते है।और सबसे ऊपर की मंजिल १४वें दलाई लामा के रहने के लिए है। वो जब भी तवांग जाते है तो इसी monestary मे ठहरते है। (सबसे ऊपर वाली फोटो )

हम लोग प्रार्थना भवन मे पहुंचे तो मुख्य द्वार और उसके आस-पास की चित्रकारी देखने लायक थी । इस प्रार्थना भवन मे कई चौकोर खम्बे है और इन खम्बों मे और भवन के अन्दर भी सुन्दर चित्रकारी की हुई है। भवन की दीवारों पार भगवान बुद्ध के १०० रूपों को दिखाया गया है।
साथ-साथ यहां पर बौद्ध धर्म के अन्य देवी-देवता के साथ चंगेज खान को भी पेंटिंग के जरिये दिखाया गया है।
यहां पर हजार हाथों वाली देवी guanyin की प्रतिमा भी देखी। अवलोकितेश्वर यानी बुद्धा को इनका ही अवतार मानते है।
भवन
के प्रमुख द्वार से प्रवेश करने पर सामने सुनहरे रंग की भगवान बुद्ध की प्रतिमा लाल रंग के वस्त्र मे नजर आई । और बुद्ध की प्रतिमा के ठीक नीचे १४वें दलाई लामा की फोटो नजर आई।



इसके नीचे एक बहुत बड़ा घी का लैम्प दिखा जो सारे समय जलता रहता है।monestary मे बुद्ध की प्रतिमा पर सफ़ेद सिल्की कपडा जिसपर बौद्ध धर्म के ८ शुभ सिम्बल बने होते है और बौद्ध धर्म का मन्त्र लिखा होता है उसे चढ़ाया जाता है।और चूँकि प्रतिमा काफी ऊँची है इसलिए इसे रोल करके ऊपर भगवान बुद्ध की तरफ फेंका जाता है।

यहां पर monks यानी लामा लोगों के रहने के लिए घर बने है जहाँ एक घर मे छोटे और बड़े लामा एक परिवार की तरह रहते है ।इनके घर मे जाने के लिए लकड़ी की सीढ़ी होती है । वैसे घर मे खाना बनाने के लिए गैस और कुकर वगैरा होते है। जरुरत का सभी सामान होता है। पर बाकी सामान कम से कम ही होता है।और हर घर मे एक बुखारी होती है जिससे कमरे को गरम रक्खा जाता है।यहां के सबसे वृद्ध लामा से भी हम लोग मिले।
और फिर यहां पर बने museum को देखने भी गए। museum को घूमना और देखना भी काफी रोचक रहा। जहाँ नीचे की मंजिल पर वस्त्र ,वाध यन्त्र ,ब्रौकेड्स,gyetongpa सुनहरी पांडुलिपि ,बर्तन और अनेकों चीजों के साथ-साथ १००० साल पुराना हाथी दांत (tusk) भी देखा। :)


और
ऊपर की मंजिल पर बड़े-बड़े बर्तन जिनमे कभी खाना बना करता था और चाय बनाने का एक ख़ास तरह का बर्तन वगैरा भी देखे। जिसे आज भी तवांग मे चाय बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है ।
स्कूल और लाइब्ररी नहीं देख पाए क्यूंकि स्कूल बंद हो चुका था। और हाँ इस monestary मे कैमरे के अलग-अलग चार्ज लगते है जैसे still camera का २० रुपया ,video camera के १०० रूपये और movie camera का ५०० रूपये लगता है।

खैर
अगली बार जब जायेंगे तब देखेंगे।आज की यात्रा अब यही ख़त्म कर रहे है। आप लोग भी थक गए होंगे। :)